प्रज्ञान ओझा ने साझा की सचिन के फाइनल टेस्ट से जुड़ी कुछ भावनात्मक बातें

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प्रज्ञान ओझा ने साझा की सचिन के फाइनल टेस्ट से जुड़ी कुछ भावनात्मक बातें

सचिन तेंदुलकर द्वारा भारत के लिए खेले गए आखिरी टेस्ट के तीसरी सालगिरह पर, बाएं हाथ के स्पिनर प्रज्ञान ओझा ने उन भावनाओं को याद किया जो भारतीय ड्रेसिंग रूम में उस वक़्त मौजूद थी जब मास्टर ब्लास्टर अपने कार्यकाल की आखिरी पारी खेलने मैदान में पहुंचे थे। उस मैच में भारत वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेल रहा था।

शायद ही ऐसी कोई आँखें थी जो उस वक़्त नम नहीं हुई थी जब 16 नवम्बर 2013 को सचिन तेंदुलकर वानखेड़े स्टेडियम से बाहर निकलते हुए अपने 24 साल लम्बे अंतर्राष्ट्रीय कार्यकाल पर विराम लगाया। मैच के बाद उनके द्वारा पुरस्कार वितरण समारोह में दिए गए भाषण के दौरान आंसुओं को रोक पाना संभव नहीं हुआ। वेस्ट इंडीज के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की शृंखला का दूसरा टेस्ट तीसरे दिन पर समाप्त हुआ और सचिन ने अपनी आखिरी पारी में 74 रन बनाये थे।

"मेरे लिए इस बात पर यकीन करना ज़रा मुश्किल हो रहा है कि सचिन पाजी को क्रिकेट छोड़े हुए तीन साल भी बीत चुके हैं," प्रज्ञान ओझा ने सोमवार को क्रिकबज़ से कहा, जो सचिन के आखिरी टेस्ट मैच में टीम का हिस्सा थे। "हम सभी उन्हें खेलते हुए देखकर बड़े हुए हैं और जब मुझे यह पता चला कि वह उनका आखिरी मैच था (इससे पहले वह एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय से निवृत्त हो चुके थे) तो मैं भी बहुत भावुक हो गया। मैं खुद को खुशनसीब मानता हूँ कि मैं उनके साथ खेल पाया," ओझा ने उस वक़्त अपनी भावनाओं को याद करते हुए कहा।  

ओझा ने वानखेड़े स्टेडियम में 80 रनों पर 10 विकेट चटकाकर मैन ऑफ़ द मैच का खिताब हासिल किया था और भारत ने उस मैच पर एक पारी और 126 रनों से जीत हासिल की थी। बाएं हाथ के स्पिनर ने याद किया कि कैसे टीम का हर सदस्य सचिन के लिए इस मैच को यादगार बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा था।

"सब उस सीरीज में अपना बेहतरीन प्रदर्शन करना चाहते थे। सब उन विशेष मैचों में विशेष योगदान देना चाहते थे। उस वक़्त की परिस्थितियों ने भी खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया था। अगर सीधे शब्दों में कहूं तो वह एक अनोखा अनुभव था," 30 वर्षीय स्पिनर ने बताया।

"मैं उस गेम में अच्छा प्रदर्शन करना चाहता था। मैं इस बात पर अड़ा हुआ था लेकिन मेरी यह मंशा अपने नाम को इतिहास के पन्नों में शामिल करने के लिए नहीं थी। मैं उस बारे में सोच भी नहीं रहा था। मेरे ख्याल से कोई भी टेस्ट जीतना ख़ास ही होता है क्योंकि आपको उसके 20 विकेट लेने होते हैं। आपको हर बल्लेबाज़ को दो बार आउट करना होता है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा करना आसान नहीं है," उन्होंने बताया।

ओझा आज भी इस बात से हैरान हैं कि कैसे फाइनल टेस्ट में ज़बरदस्त रोमांच होने के बावजूद, लिटिल मास्टर ड्रेसिंग रूम में कितने शांत थे।

"मैं सचिन पाजी को भी इसका श्रेय देना चाहूँगा। हालांकि वह थोड़े भावुक थे, लेकिन आखिरी दिन तक उन्होंने अपनी सरलता को कायम रखा। इस रोमांचक श्तिति में भी, उन्होंने इस बार का ध्यान रखा कि यह टेस्ट बाकी टेस्ट से अलग न लगे। फाइनल टेस्ट से पहले होटल में ब्रेकफास्ट के दौरान, उन्होंने चीज़ों को सरल रखना चाह," ओझा ने अपनी आँखों देखि बताई।

सबको उम्मीद थी कि सचिन अपने कार्यकाल की आखिरी पारी में शतक जड़ेंगे लेकिन क्रिकेट के महारथी बल्लेबाज़ ने 74 रनों की बेहतरीन पारी खेली और तीसरे दिन पर भारत की जीत के साथ, नम आँखों से भारतीय क्रिकेट से विदाई ली। और बाकी प्रशंसकों की तरह ओझा भी ऐसे मौके पर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं पा सके।

"हैरानी की बात यह कि टेस्ट ख़त्म होने के बाद ही वह काफी भावुक हो गए थे। भावना बुरी हो या अच्छी उसे रोके रखना संभव नहीं होता। जिसने 24 साल से ऊपर क्रिकेट खेला हो, उसके लिए एकाएक इस बात का एहसास होना की उस वक़्त के बाद वह मैदान में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा, यह बहुत ही बड़ी बात होती है।

"और फिर उन्होंने भाषण दिया! सभी भारतवासी चुपचाप उन्हें सुनते रहे। टीम में सभी, उस वक़्त, बेहद भावुक थे। उनकी स्पीच ने सबके दिलों को छू लिया। उन्होंने उस वक़्त उन सभी का नाम लिया जिन्होंने उन्हें फील्ड में और फील्ड से बाहर एक बेहतरीन शक्सियत बन्ने में मदद की। एक व्यवहारिक और सच्चा इंसान बनने में मदद की," ओझा ने याद किया।  

बाएं हाथ के स्पिनर ने आखिर में कहा, "ज़ाहिर सी बात है वह सीरीज मेरे कार्यकाल का सबसे ख़ास सीरीज थी। मैं उसका हर एक पल उम्रभर याद रखूँगा। लेकिन सचिन पाजी के साथ बिताये गए हर पल बहतु ज्यादा ख़ास है। वह पल मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है और उस सीरीज का हिस्सा बन मैं खुद को खुशनसीब मानता हूँ।

15,921 टेस्ट रन, 18,426 ODI रन, 100 शतक, अनगिनत यादें, एक नाम - सचिन रमेश तेंदुलकर। शुक्रिया सचिन!

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