अनिल कुंबले : 2002 में हैडिंगले टेस्ट एक क्रांतिकारी मोड़ था

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अनिल कुंबले : 2002 में हैडिंगले टेस्ट एक क्रांतिकारी मोड़ था

भारत के टेस्ट रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुँचने की कोशिश के बीच, अनिल कुंबले पिछले दशक में, साल 2002 में हैडिंगले के टेस्ट में मिली जीत को एक अहम क्रांतिकारी मोड़ बताते हैं। दिग्गज खिलाड़ी के समर्थन में वीरेन्द्र सहवाग ने क्रांतिकारी परिवर्तन का श्रेय तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली को दिया।

90 के दशक के आखिरी सालों में भारत, पहले मोहम्मद अजहरुद्दीन और फिर सचिन तेंदुलकर, की कप्तानी में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था। 2000 में कप्तानी का यह कमान गागुली के हाथों में सौंपा गया। एक साल के अन्दर ही, दिग्गज खिलाड़ी ने महान खिलाड़ियों से बनी टीम को एक महान टीम में बदल दिया। तब तक जो टीम अपने अधिकतर मैचों में असफल रहती थी, वह एकाएक घरेलू तथा विदेशी खेलों में विश्व-विजेता बन गयी। कुंबले ने टीम की मानसिकता में आए इस बदलाव का श्रेय गांगुली के नेतृत्व को दिया।  

भारत के 500वे टेस्ट और देश में खेले जाने वाले 250वे टेस्ट के मौके पर आयोजित एक समारोह में, कुंबले ने कहा, “हमारी टीम विभिन्न बदलावों से गुजारते हुए काफी लचीली हो गयी थी। कोलकाता के टेस्ट (2001) ने हमारी मानसिकता बदली और हैडिंगले के टेस्ट (2002) में हमें इस बात पर यकीन हुआ कि हम विदेश में भी जीत सकते हैं। पर्थ टेस्ट (2008) की जीत भव्य थी और फिर हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हालांकि, कुंबले ने हैडिंगले की जीत को भारतीय क्रिकेट में आए बदलाव का पल बताया। भारत लॉर्ड्स में हुए पहले टेस्ट में हार चुका था वहीँ दूसरा टेस्ट ड्रा रहा था जिस वजह से वह लीड्स के टेस्ट से पहले सीरीज में 1-0 से पीछे था। पहली पारी में राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और गांगुली के शतकों की बदौलत भारत ने 600 से अधिक रनों का विशाल स्क्रोर हासिल किया। कुंबले ने उस मैच में सात विकेट भी लिए थे जिसके बाद इंग्लैंड को एक पारी से हार का सामना करना पड़ा था। श्रृंखला को ड्रा करते हुए चौथा और आखिरी टेस्ट भी ड्रा हुआ लेकिन इसके साथ ही इस बात की भी पुष्टि हो गयी थी कि भारत विदेशी भूमि पर भी जीत सकता है।     

कुंबले ने टेस्ट को याद करते हुए कहा, “सर्वश्रेष्ठ पल का चुनाव करना कठिन है। लेकिन मेरे लिए हैडिंगले का टेस्ट भारतीय टेस्ट एक क्रांतिकारी पल था। सफलता वहीं से शुरू हुई थी।”

बढ़िया टीम की कप्तानी करने के लिए खुद को खुशनसीब मानते हुए गांगुली ने कहा, “उनका नेतृत्व करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है और उस टीम में राहुल (द्रविड़), सचिन (तेंदुलकर), हरभजन (सिंह) जैसे खिलाड़ी थे –वह एक सुनहरी पीढ़ी थी। हमारे पास बेहतरीन कुशलता वाले खिलाड़ी थे। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को बेहतर बना दिया था। (इसे भी पढ़े: गांगुली ने खोला सचिन और वीवीएस लक्ष्मण के ड्रेसिंग रुम वाले राज़)  

सहवाग ने भी गांगुली की कप्तानी की तारीफ की। “दादा का एक ही लक्ष्य था – विदेशों में जीतना और सर्वश्रेष्ठ बनना। उनकी कप्तानी आक्रामक थी और वह अपनी टीम का साथ देते थे। मुझे याद है एक बार मैं गंभीर के साथ डिनर कर रहा था और तब उन्होंने कहा था, ‘तुम अगले चार मैच खेलोगे, प्रदर्शन मायने नहीं रखा, बस जाओ और अपना 100% दो।’ हमें काफी सुकून मिला था।”

मानसिकता बहुत अहमियत रखती है क्रिकेट नहीं बदला है लेकिन मानसिकता बदल गयी है मुझे कभी इस बात का डर नहीं लगा कि कहीं मैं टीम में अपनी जगह न खो दूं क्योंकि मेरे कप्तान मुझे मैदान में जाकर तनावरहित होकर खेलने को कहते थे कप्तान ने हमेशा से ही अहम भूमिका निभाई है, फिर चाहे वह सौरव हों, कुंबले हों या एम.एस. धोनी हर सफल खिलाड़ी के पीछे एक उतने ही महान कप्तान का हाथ होता है, उन्होंने कहा 

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