सुप्रीम कोर्ट BCCI को दे सकता है आर्थिक दण्ड

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सुप्रीम कोर्ट BCCI को दे सकता है आर्थिक दण्ड

सुप्रीम कोर्ट BCCI को, लोढा समिति के सुझावों पर अमल करने तक, आर्थिक दण्ड दे सकता है। इन दण्डों के अंतर्गत, BCCI द्वारा इस्तेमाल की गयी धनराशि को सीमित किया जा सकता है तथा बोर्ड को किसी भी प्रकार के वित्तीय कॉन्ट्रैक्ट एवं समझौते के लिए लोढा समिति से अनुमति लेनी पड़ सकती है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश, टी.एस ठाकुर ने कहा है कि कोर्ट के पास एक 'अतिरिक्त विकल्प' है जिसमें वे एक स्वतंत्र प्रसाशन के अंतर्गत आने वाले एक निकाय का चयन, BCCI के अधिकारीयों के स्थान पर कर सकते हैं, जिससे वे अन्य विकल्पों पर भी काम कर पाएंगे जो 'समान मात्रा में प्रभावशाली' होंगे।

"क्या निर्धारित राशि से ऊपर के धन की निकासी पर प्रतिरोध लगा दिया जाये? क्या जस्टिस लोढा की समिति को अपने मन मुताबिक किसी आर्थिक कॉन्ट्रैक्ट में दखल देने की अनुमति दे दी जाये? इस बारे में हम जांच करेंगे," चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में बनी समिति ने कहा।

वरिष्ठ समिति ने क्रिकेट बोर्ड से कहा कि वह BCCI की तब तक कोई मदद नहीं कर सकते जब तक वह लोढा समिति के सुझावों पर अपनी राय सामने नहीं रखते, कि क्या बोर्ड इन सुझावों के समर्थन में है और कब तक वे इन संशोधनों पर अमल कर पायेंगे।

"हम यह जानना चाहते हैं कि आपकी वास्तविक दिक्कतें क्या हैं? लेकिन हर कदम पर हमें एक बचाव और विरोध का भाव मिलता है," समिति ने कहा।

BCCI का प्रतिनिधित्व करने वाले कपिल सिब्बल ने कहा कि बोर्ड संस्थापक सदस्यों के मत को हटाने और 'वन स्टेट-वन वोट' सुझाव के खिलाफ है।

"इससे पारदर्शिता नहीं होगी। हमारे पास तीन उत्तर-पूर्वी राज्य हैं जो पूर्ण-कालीन सदस्य हैं। उत्तर पूर्व के वो राज्य, जिनमें न तो सुविधाएँ हैं और ना ही जहाँ क्रिकेट का खेल अधिक प्रचलित है, उन्हें वोट देने से भ्रष्टाचार बढ़ सकता है क्योंकि इससे पैसे और पक्षपात के बदले लोग वोट मांगना शुरू कर देंगे," सिब्बल ने अपने तर्क में कहा।   

सिब्बल ने कहा कि बोर्ड को, लोढा समिति द्वारा प्रस्तावित संघ संबंधी नए ज्ञापन के लिए, राज्य संघों को 'मनाने' का मुश्किल काम करना होगा।  

"हमें थोड़ा वक़्त दिया जाये। ऐसा नहीं है कि हमने किसी भी सुझाव पर अमल नहीं किया है। लेकिन हमें थोड़ा वक़्त चाहिए। हम इस कोर्ट के सामने, हमारे द्वारा किये गए कार्य और अगले कुछ महीनों तक हमारे कार्यक्रम का उल्लेख करने के लिए, एक विस्तृत हलफनामा रखेंगे," सिब्बल से समिति से कहा।

हालांकि, सिब्बल ने लोढा समिति द्वारा दिए गए कुछ सुझावों पर सवाल भी खड़े किये, जिन्हें उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 'आदेश से अलग' करार दिया। उन्होंने कहा कि उन सुझावों से बोर्ड की कार्यशैली और अधिक पारदर्शी नहीं होगी, जितनी पहले से है।  

"लोढा पैनल क्रिकेट का प्रसाशन करना चाहती है, जो कोर्ट के आदेश में सम्मिलित नहीं है। चयनकर्ताओं की संख्या को तीन कर देने से पारदर्शिता कैसे आएगी? समिति ने IPL और अन्य खेलों के केलिन्डर को भी तय कर दिया है। इससे पारदर्शिता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? प्रसाशन की बागडोर हमारे हाथों ही रहना चाहिए। हम पारदर्शिता लाने के लिए सब करने को तैयार हैं," सिब्बल ने कहा।

वरिष्ठ वकील औए न्यायमित्र, गोपाल सुब्रमनियम ने कहा कि किसी भी सुझाव पर अमल करने से इनकार करने के कारण, BCCI ने अब खुद को असैन्य और आपराधिक दण्डों का पात्र बना लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि BCCI को उन्हीं हालातों में अतिरिक्त वक़्त दिया जाना चाहिए, अगर वे लोढा समिति के सभी सुझावों पर बिना किसी शर्त के अमल करते हैं।

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