अहम का टकरावः बीसीसीआई और आईसीसी आमने-सामने

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अहम का टकरावः बीसीसीआई और आईसीसी आमने-सामने

ह कहना गलत नहीं होगा कि बीसीसीआई तथा आईसीसी आपस में दोस्त नहीं रहे, जैसा वो कहा करते थे। यहां आर्थिक लाभ से अधिक कुछ और है जिसने क्रिकेट के इन दो शक्तिशाली ताकतों के बीच शत्रुता की चिंगारी को भड़का दिया है।

इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के दरम्यान बढ़ती तल्खी लोगों के सामने आ चुकी है और आने वाले वक्त में इसके कम होने के आसार बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से दोनों के हितों की यह जुबानी जंग एक अलग ही स्तर पर जा पहुंची है, पर असल में तो इस जंग में बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और आईसीसी के स्वतंत्र प्रभारी अध्यक्ष शशांक मनोहर के बीच के मतभेद शामिल है।

ऐसी नियुक्ति जो होनी ही नहीं चाहिए थी!

बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की अक्टूबर 2015 में मृत्यु के बाद, बीसीसीआई के सदस्य अधिकारियों ने विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के शशांक मनोहर को सर्वसम्मति से अध्यक्ष पद के लिए शायद इसी उम्मीद से चुना था कि क्रिकेट प्रशासन के सुनहरे दिन आएंगे। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आईपीएल 2013 में हुए मैच फिक्सिंग प्रकरण की जांच के लिए नियुक्त लोढ़ा समिति के समक्ष कई दफा बीसीसीआई की गर्दन झुकी और बार-बार उनके प्रशासनिक कार्यों की पारदर्शिता के उपर प्रश्न चिन्ह उठाए जाने लगे। ऐसे समय में 2008 से 2011 तक बीसीसीआई अध्यक्ष रहे शशांक मनोहर जो कि भारत के एक कुशल वकील हैं, अपने अनुभवों के साथ बीसीसीआई के लिए एक मसीहा के रूप में आए।

पर मई 2016 में बीसीसीआई अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के लगभग 8 महीने बाद ही, सभी को यह साफ तौर पर लगने लगा कि मनोहर अपने पद से इस्तीफा देने वाले हैं क्योंकि उनके नाम का ऐलान  आईसीसी के नए स्वतंत्र प्रभारी अध्यक्ष के तौर पर होने वाला था। एक ऐसी स्थिति जहां अध्यक्ष स्वतंत्र होकर अन्य सदस्यों के हितों तथा विचारों पर अपने निर्णय ले सकता है। इसका अर्थ है कि बड़ी शक्तियां जैसे बीसीसीआई, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड मनोहर को छू भी नहीं सकती। इस फैसले से नाराज भारत की घरेलू क्रिकेट इकाइयों ने भी विरोध किया, पर मनोहर और बीसीसीआई के रिश्तों का यह तनाव लंबे अरसे बाद प्रत्यक्ष रूप से उभरकर सामने आया।

कानूनी माथापच्ची से बचाव!

जब कोई दोस्त दुर्घटना के बाद बीच सड़क पर हमें घायल छोड़ जाता है तो चोट से कहीं ज्यादा दर्द उसके धोखे से होता है। मनोहर का बीसीसीआई छोड़ने का फैसला मुख्यतः लोढ़ा समिति द्वारा  प्रस्तावित सुधारों जिसमें बोर्ड के प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित करने को कहा था, के कारण लिया गया है। इस समिति की अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा द्वारा की गई, जिसने कई सुधार प्रस्तावित किए। समिति ने छोटे-मोटे बोर्ड जैसे पुडुच्चेरी को सहयोगी सदस्य बनाने पर जोर दिया और साथ ही बीसीसीआई को क्रिकेट खिलाड़ी संघ को बनाने तथा उसे फंडिंग देने को कहा। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि समिति ने एक साल के दौरान बीसीसीआई के निर्णयों पर रोक लगा दी।

लोढ़ा समिति के ऐसे अजीबो-गरीब प्रस्तावों के खिलाफ बीसीसीआई और उसके सदस्य मनोहर की ओर से मदद की आस में थे। वहीं दूसरी तरफ इतना सब होने के बाद, मनोहर ने अपनी कानूनी समझ का इस्तेमाल करते हुए बीसीसीआई के अपने सहकर्मियों और मित्रों को यह साफ कर दिया कि जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय इस समिति के प्रस्तावों को प्रमाणित कर देगी वे उसी क्षण अपना अध्यक्ष पद त्याग देंगे। फरवरी 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने जब इन प्रस्तावों को प्रमाणित किया तब मनोहर ने बीसीसीआई अध्यक्षता छोड़ते हुए आईसीसी की स्वतंत्र अध्यक्षता का अपना रास्ता साफ किया। अनुराग ठाकुर, जो कि उस समय मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत थे, उन्हें भी मनोहर के इस फैसले से काफी निराशा और आघात पहुंचा था। हाल ही में उन्होंने कहा कि ‘‘जब बोर्ड (बीसीसीआई) को अध्यक्ष के तौर पर मनोहर की सबसे ज्यादा जरूरत थी तब उन्होंने बोर्ड को बीच राह में ही छोड़ दिया। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे डूबते जहाज को बाकि लोगों से पहले कप्तान ही छोड़ दे।’’

जेब पर चली कैंची

सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई के अलावा शशांक मनोहर द्वारा लिए गए ऐसे आर्थिक फैसले भी हैं जिनकी बदौलत उनके अपने ही देश में कई शत्रु बन गए हैं। 2016 में दुबई में हुई आईसीसी की बैठक में मनोहर के ‘बिग थ्री’ राजस्व व्यवस्ािा को हटाने के लिए वोट देने के फेसले पर बीसीसीआई का प्रत्येक सदस्य हैरान हो गया। वह व्यवस्था जो बीसीआई, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया और ईसीबी को आईसीसी की सालाना राजस्व का एक बड़ा हिस्सा देता है, उसे आईसीसी के संवैधानिक सुधारों में शामिल किया गया। खबरों के अनुसार इस बैठक के दौरान मनोहर ने आईसीसी राजस्व में भारत के 22 प्रतिशत शेयरों में से 6 प्रतिशत देने पर भी अपनी सहमति जताई। यह निर्णय उन्होंने बोर्ड के किसी भी सदस्य के परामर्श के बिना लिया।

हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में अनुराग ठाकुर ने इस सत्य की ओर उंगली उठाते हुए कहा कि ‘‘सभी को यह समझना होगा कि जब आईसीसी के संविधान में बदलाव हुआ तब मनोहर बीसीसीआई अध्यक्ष थे। उस समय ही बीसीसीआई के सदस्यों को विश्वास में ले लेना चाहिए था, पर तब वे अपने आईसीसी के पद को सुनिश्चित करने की कोशिश में लगे हुए थे।’’

इसका अर्थ था कि बीसीसीआई को और जख्मी कर दिया गया, जहां पहले से ही वह सर्वोच्च न्यायालय में अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।

चैंपियन्स ट्रॉफी बजटः

दोनों के बीच के रिश्तों पर संकट के बादल तब और गहरा गए जब एक रिपोर्ट के मुताबिक आईसीसी द्वारा 2017 में इंग्लैंड में आयोजित होने वाली चैंपियन्स ट्रॉफी के लिए 135 मिलियन यूएस डॉलर का बजट पास किया गया, वहीं भारत में 2016 में हुए टी-20 विश्व कप के आयोजन के लिए केवल 45 मिलियन डॉलर का बजट दिया गया था। दोनों पार्टियों के बीच संबंधों में खटास इस फैसले के कारण बढ़ गई जो अगस्त में आयोजित आईसीसी की बैठक में लिया गया और जिसमें बीसीसीआई शामिल ही नहीं था। बीसीसीआई को अहम फैसले में भागीदार न बनाने के आईसीसी के इस कृत्य की भारतीय बोर्ड सचिव अजय शिर्के ने आलोचना करते हुए इसे बीसीसीआई का ‘अपमान’ बताया। साथ ही भारत के इस टूर्नामेंट में भाग न लेने की धमकी भी दे डाली।

बीसीसीआई की तरफ से यह समझना आसान है कि चैंपियन्स ट्रॉफी में 19 दिनों में 15 मैचों की तुलना में 27 दिनों में 58 मैचों के टूर्नामेंट के लिए 3 गुना कम बजट का प्रस्ताव रखा गया था। मनोहर ने सभी रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि चैंपियन्स ट्रॉफी के लिए 135 मिलियन के बजट का प्रस्ताव बिल्कुल भी सच नहीं है और टी-20 विश्व कप टूर्नामेंट के लिए भारत को 55 मिलियन का बजट मिला जिसमें उत्पादन लागत शामिल थी। अब भी असली बजट एक रहस्य ही है। बीसीसीआई इस मुद्दे को नकारना नहीं चाहती क्योंकि वह अंतिम बजट की प्रमुख भागीदार है।

अनुराग ठाकुर ने आईसीसी से गुस्से में सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि ‘‘इसलिए हमने ये मुद्दा तब उठाया जब सब शांत थे, हम चैंपियन्स ट्रॉफी के लिए प्रस्तावित हुए बजट को देखना चाहेंगे और उसके साथ तुलना करना चाहेंगे। बीसीसीआई ने यह मुद्दा इसलिए उठाया क्योंकि हम अपना एक-एक पैसा बचाना चाहते हैं। यह पैसा सबके लिए बचाया जाएगा, पूरे 105 देशों के लिए न की केवल बीसीसीआई के लिए।’’

खेल जगत की दो बड़ी प्रशासनिक इकाइयों के बीच इस झगड़े का कोई अंत नजर नहीं आता जबकि असली मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। एक औसत क्रिकेट फैन के तौर पर, हम ये आशा करते हैं कि ये सत्ता की लड़ाई पिच का खेल प्रभावित ना करे और मैदान में क्रिकेट अपने असली उद्देश्य के साथ बना रहे।

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