इतिहास के पन्नों में 500 टेस्टः 1932 से अब तक, भारत की ऐतिहासिक टेस्ट यात्रा

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इतिहास के पन्नों में 500 टेस्टः 1932 से अब तक, भारत की ऐतिहासिक टेस्ट यात्रा

भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का समूह है लेकिन क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो इन सभी विभिन्नताओं को एक धागे में पिरोता है। जब भारत अपना औपचारिक 500वां टेस्ट मैच 22 सितंबर से खेलेगा तब यह भारत के लिए किसी जश्न से कम नहीं होगा।

ले ही क्रिकेट की जड़े इंग्लैंड में हो। लेकिन ब्रिटेन द्वारा भारतीय उप-महाद्वीप में क्रिकेट को स्थापित करने के बाद से ही ये खेल यहां दिन-प्रतिदिन फला-फूला और भारतीयों ने इस खेल को अपना समझ कर ही भरपूर प्यार दिया। अपने 84 साल के शानदार अनुभव में भारतीय टेस्ट टीम ने कई उतार-चढ़ाव देखे। हार का कड़वा स्वाद उन्हें सुधार की सीख देता है तो वहीं जीत का उल्लास उन्हें आगे बढ़ने और अधिक मैच जीतने की इच्छाशक्ति देता है। भारतीय क्रिकेट को अपने 500 मैच तक पहुंचने के लिए एक बहुत लंबे दौर से गुजरना पड़ा, इसी कारण 500 केवल एक संख्या मात्र नहीं है। ये संख्या भारतीयों के इस खेल को दिए प्यार को मापती है, बेहतर स्थिति को हासिल करने के लिए किए गए कठोर परिश्रम को मापती है और सबसे महत्वपूर्ण ये संख्या भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों द्वारा देखे गए उस स्वपन को भी दर्शाती है जो उन्होंने भारतीय टीम द्वारा खेले गए पहले औपचारिक टेस्ट मैच में देखा था।

वह कानपुर का ग्रीन पार्क मैदान ही है जहां यह ऐतिहासिक 500वां मैच होगा और वहीं टीम को न्यूजीलैंड जैसी खतरनाक टीम का सामना करना होगा। बीसीसीआई ने इस मैच को देखने के लिए भारतीय पुरुष और महिला टेस्ट टीमों के पूर्व कप्तानों को आमंत्रित किया है। जब सभी पूर्व कप्तान एक ही जगह इस ऐतिहासिक मैच को देखने के लिए इकट्ठा होंगे तब कई पुरानी यादों को ताजा किया जाएगा। तब वे याद करेंगे की कब वे इस खेल के प्रति इतने समर्पित हुए, कैसे उन्होंने पहली बार बाॅलिंग या बैटिंग करना सीखा, कब अलग-अलग समय पर उन्होंने अपने देश के लिए डेब्यू मैच खेला और किन-किन अवसरों पर देश को यादगार जीत दिलाई थी।

भले ही क्रिकेट का भारत में इतिहास औपचारिक रूप से केवल 84 साल पुराना हो लेकिन ब्रिटिश द्वारा ये खेल 18वीं सदी में ही भारत आ गया था। यह माना जाता है कि भारत में पहला क्रिकेट मैच 1721 में खेला गया। उसी के बाद से ही क्रिकेट ने धीरे-धीरे पर लगातार भारतीयों के दिलों में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी और पारसियों द्वारा 1848 में बाॅम्बे में ओरिएंटल क्रिकेट क्लब के नाम से पहला भारतीय क्रिकेट क्लब खोला गया। राहुल द्रविड़ ने एक बार कहा था कि ‘‘बल्लेबाजी में पहला रन बनाना सबसे मुश्किल काम होता है।’’ उसी तरह भारत में क्रिकेट रातों-रात कहीं से नहीं आ गया है। पारसियों ने कई सालों की मशक्कत के बाद इस खेल से बाकि धर्म के लोगों को जोड़ा और एक चतुर्भुजीय टूर्नामेंट पारसियों, मुस्लिमों, सिखों और यूरोपियन के बीच आयोजित की। साल बीतते गए और धीरे-धीरे भारतीय मिट्टी से कई हुनरमंद खिलाड़ियों का जन्म होने लगा। उनमें से ही थे रंजीत सिंह जी और दिलीप सिंह जी। ये महान खिलाड़ी इंग्लैंड क्रिकेट के लिए भी खेला करते थे। इन्हीं के नाम पर प्रथम श्रेणी स्तर पर रणजी ट्राॅफी और दिलीप ट्राॅफी का आयोजन होता है। देश के झंडे के तले क्रिकेट खेलने की चाह और उसके लिए भारतीय टीम द्वारा किए गए कठोर परिश्रम के नतीजे में ही टीम का पहला औपचारिक दौरा 1911 में इंग्लैंड में हुआ। ये अलग बात थी की उन्हें इंग्लैंड की नेशनल टीम के बजाए काउंटी टीम के साथ खेलने का मौका दिया गया। आखिरकार 25 जून 1932 को लंदन के लॉर्ड्स के मैदान पर ब्रिटेन की नेशनल टीम के साथ औपचारिक टेस्ट मैंच खेल कर भारत टेस्ट खेलने वाला छठा देश बन गया। इस तीन दिवसीय मैच में भारत ने गेंदबाजी क्षेत्र में तो अच्छा प्रदर्शन करते हुए इंग्लैंड को पहली पारी में सिर्फ 258 रनों पर ही रोक दिया जिसमें सबसे अहम प्रदर्शन मोहम्मद निसार ने किया जिन्होंने 93 रन देकर 5 विकेट झटके। पर बाद में भारतीय टीम बल्लेबाजी में लड़खड़ा गई और सिर्फ 189 रनों पर सिमट गई, जिसमें सी.के. नायडू ने सबसे अधिक 40 रन बनाए थे। इंग्लैंड ने अपनी दूसरी पारी में 275 रन और बनाए तथा भारत के लिए 346 रनों का लक्ष्य रखा जिसके जवाब में भारत केवल 187 रन ही बना सकी और 158 रनों से यह मैच हार गई। भारत ने अगले तीन दशकों तक काफी परिश्रम किया पर 1952 तक एक भी टेस्ट मैच जीतने में असफल रही।

इन सालों के दौरान भारत ने अलग-अलग विपक्षी टीमों के खिलाफ कई मैच खेले। भले ही वे इन मुकाबलों में जीते नहीं पर उन्होंने इन मैचों से कई सीख और अनुभव समेट लिए थे जो उन्हें एक दिन बेहतरीन टीम बनाने में सहायक होते। 1933 में भारत ने अपनी सरजमीं पर एक श्रृंखला खेली। भले ही इंग्लैंड ने यह सीरीज 2-0 से जीती हो लेकिन लाला अमरनाथ ने मुंबई के जिमखाना ग्राउंड में भारत के लिए पहला टेस्ट शतक बनाकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था। अगले दो दशकों तक भी भारत के लिए नतीजे वैसे ही निराशाजनक रहे। लेकिन धीरे-धीरे हार का अंतर कम होने लगा।

आखिरकार वो समय आ ही गया जब भारत ने अपनी पहली जीत का स्वाद चखा और वो भी इंग्लैंड के खिलाफ, जो इस खेल का जन्मदाता माना जाता है। यह मैच भारत का 25वां औपचारिक टेस्ट मैच था और इसका आयोजन चेन्नई में हुआ था। भारत विजय हजारे की कप्तानी में एक पारी और 8 रन से जीता, जिसमें पंकज राॅय और पाॅली उमरीगर ने शतक जमाए तो वहीं एम मांकड़ ने शानदार गेंदबाजी करते हुए पूरे मैच में 108 रन देकर 12 विकेट झटके। वहीं भारत ने एक श्रृंखला घरेलू सरजमीं पर ही न्यूजीलैंड के खिलाफ 1956 में जीती, पर उसके बाद के पांच साल भारतीय टीम के लिए थोड़े मुश्किल भरे थे क्योंकि वे इंग्लैंड और आॅस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू मैदानों पर अपने मैच हार गई थी। लेकिन 1960 में भारतीय टीम ने पूरी ताकत के साथ वापसी करते हुए घरेलू मैदान में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज जीती और आॅस्ट्रेलिया तथा पाकिस्तान के खिलाफ ड्रा खेला। अपनी मुकुट में एक और हीरा जोड़ते हुए भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 1967-68 में आयोजित सीरीज को अपने नाम किया और पहली बार विदेशी सरजमीं पर ये कारनामा किया। भारतीय क्रिकेट के लिए 1960 एक अहम पड़ाव था।

आगामी दशक में कई ऐसे दिग्गज भारतीय खिलाड़ी सामने आए जिन्होंने घरेलू मैदान में भारत को एक बड़ी ताकत बनाया। एक तरफ भारत को सुनील गावस्कर और गुडप्पा विश्वनाथ जैसे बल्लेबाज मिले और दूसरी तरफ स्पिन गेंदबाजी में ईरापल्ली प्रसन्ना, श्रीनिवास वेंकटराघवन, बिशन सिंह बेदी और बीएस चंद्रशेखर मिले। कुल मिलाकर भारत के पास गेंदबाजी में ऐसा स्पिन और अटैक मौजूद था जो विपक्षी बल्लेबाजों को अपनी फिरकी में उलझा सकते थे और बल्लेबाजी क्रम इतना मजबूत था की विपक्षी गेंदबाजी की बखिया उधेड़ सकते थे। 1971 में भारत इस टीम के साथ इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के खिलाफ सीरीज जीतने में कामयाब रहा।

1980 में भारत प्रतिभावान खिलाड़ियों का एक गढ़ बन चुका था।  कपिल देव, मोहम्मद अजरूद्दीन और रवि शास्त्री जैसे खिलाड़ियों ने टीम को और मजबूत बनाया। 1983 में भारत ने कपिल देव की अगुवाई में विश्व कप जीता जिसके कारण वो भारत के महान क्रिकेटर बन गए। इसी दौर में गावस्कर पहले ऐसे क्रिकेटर बने जिसने टेस्ट मैचों में 34 शतक अपने नाम करके 10,000 रन पूरे किए। 1980 तक भारत ने टेस्ट क्रिकेट में अपने 50 साल पूरे किए थे लेकिन वो 194 टेस्ट मुकाबलों में से अब तक केवल 36 में ही जीत दर्ज कर पाए थे। 1990 में क्रिकेट के नए सितारों का आगमन हुआ।

1990 में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, जवागल श्रीनाथ, राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले ने पदार्पण किया। 1990 के शुरूआती दौर में कपिल देव ने सर रिचर्ड हेडली को पीछे छोड़ दिया। वे टेस्ट मैचों में सबसे अधिक 434 विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। इस दशक के दौरान मोहम्मद अजरूद्दीन की कप्तानी में भारत विदेशी सरजमीं पर कोई जीत दर्ज नहीं कर पाई लेकिन होम ग्राउंड में अच्छा प्रदर्शन जारी रखते हुए 30 में से 17 में जीत अपने नाम की। भारतीय क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को 1990 के दौरान कप्तान बनाया गया लेकिन साउथ अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया में सीरीज हारने के कारण उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। कप्तानी की बागडोर एक बार फिर अजरूद्दीन को सौंपी गई लेकिन मैच फिक्सिंग कांड ने उनके करियर को समाप्त कर दिया। उनके बाद सौरव गांगुली को भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। दादा के नेतृत्व में कई बड़े बदलाव किए गए। 2001-02 के दौरान उनकी कप्तानी में भारत ने श्रीलंका, इंग्लैंड, जिम्बावे और वेस्ट इंडीज के खिलाफ टेस्ट मुकाबले जीते। उनकी नुमाइंदगी में भारत ने आॅस्ट्रेलिया को उसकी ही जमीं पर ड्रा पर रोका और 2003-04 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट सीरीज जीती। शानदार तरीके से टीम की कमान संभालने के कौशल के कारण गांगुली प्रशंसकों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए।

फिर भी कोच ग्रेग चैपल और सौरव गांगुली के बीच हुए मतभेद के कारण उन्हें बाहर का रास्ता देखना पड़ा। राहुल द्रविड़ को कप्तान बनाया गया और उन्होंने सन् 1971 के बाद 2006 में कैरिबियाई देश में भारत को पहली टेस्ट सीरीज की जीत से रूबरू कराया। राहुल द्रविड़ के कप्तानी छोड़ने के बाद महेन्द्र सिंह धोनी को तीनों प्रारूपों में भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। हालांकि टेस्ट टीम की कप्तानी उन्हें तुरंत नहीं सौंपी गई। कुछ समय तक टेस्ट टीम के कप्तान रहे अनिल कुंबले के रिटायरमेंट के बाद ये जिम्मेदारी धोनी को दी गई। धोनी की कप्तानी में श्रीलंका को 2-0 से हराकर भारतीय टीम अपने क्रिकेट इतिहास में पहली बार विश्व की सर्वश्रेष्ठ टेस्ट टीम बनी।

उस समय के बाद से अब तक कई लोग इस बात के गवाह बने हैं कि धोनी के नेतृत्व में भारत ने किस तरह प्रगति की और अब वैसी ही तरक्की विराट कोहली की कप्तानी में देखने को मिल रही है। हाल ही में वेस्ट इंडीज और श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में मिली जीत ने इस युवा खिलाड़ी के मनोबल को बढ़ाया है और आने वाली न्यूजीलैंड सीरीज में ये क्रिकेटर अपने रूतबे को और बढ़ाने की कोशिश करेगा। ये सफर काफी लंबा रहा है। 499 टेस्ट मैच और 129 जीत और जिनमें से ज्यादातर कामयाबी हाल ही में हासिल की गई है। ये 500वां टेस्ट मैच निसंदेह इस यात्रा को एक नई उपलब्धि देगा। हालांकि, इस मैच में जीत असंख्य भारतीय प्रशंसकों के दिलों में खुशी, उल्लास और संपूर्णता का भाव भर देगी जो हर बुरे या अच्छे समय में अपनी टीम के साथ खड़े रहते हैं।

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