‘विराट’ नेतृत्व में नए युग का आगाज

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‘विराट’ नेतृत्व में नए युग का आगाज

न्यूजीलैंड के खिलाफ कानपुर टेस्ट मैच के दौरान कप्तान विराट कोहली ने जिस प्रकार का निर्णय लिया उससे साफ पता चलता है कि भरतीय टेस्ट क्रिकेट में किस चीज की कमी थी। गौर से देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कैसे भारतीय कप्तान ने अपने काबिलेतारीफ नेतृत्व से पूरा का पूरा पासा ही पलट दिया।

2001 की गर्मियों में जब आॅस्ट्रेलिया भारत दौरे पर आई तब ऐसा लगा जैसे उस चिलचिलाती धूप में भी बसंत का एहसास छिपा हो। सौरव गांगुली के कमान संभालने से पहले भारतीय क्रिकेट दशकों तक अपनी खराब परफाॅर्मेंस से जूझता रहा। लेकिन हर तरह की आशंकाओं को उस वक्त मुंहतोड़ जवाब मिला जब 15 मार्च 2001 को ईडन गार्डन में देश ने टीम की एक ऐतिहासिक आक्रामक क्षमता का आनंद उठाया। मैच में नजर आ रही हार के बीच वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने अपने प्रदर्शन से भारतीय खेमे को खुश होने की वजह जरूर दी। लेकिन इस बीच सौरव गांगुली के एक फैसले ने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने पारी घोषित करते हुए आॅस्ट्रेलियाई टीम को 384 रनों का लक्ष्य दिया। कुछ लोगों को लग रहा था की टीम जीत सकती है लेकिन अब तो विरोधी टीम को ड्राॅ पर रोक पाना भी मुश्किल नजर आ रहा था। सबके मन में एक ही सवाल था, आखिर पारी क्यों घोषित की गई? बल्लेबाजी के लिए अच्छी पिच थी और लगातार 17 टेस्ट मैच जीत चुकी कंगारू टीम के विजय रथ को रोकना मुश्किल था। मगर स्टार खिलाड़ियों से सजी आॅस्ट्रेलियाई टीम के सामने भारतीय दल ने घुटने नहीं टेके।

इस मुकाबले के बाद सौरव गांगुली के नेतृत्व में आने वाले दशक के लिए भारतीय टीम की रणनीति जाहिर हो गई। उनकी कप्तानी में भारत ने बुरे पर्यटक की छवि से बाहर निकलते हुए इंग्लैंड और आॅस्ट्रेलिया से उनकी ही सरजमीं पर उनसे मुकाबला किया, कई टेस्ट मैचों में उन्हें जीत हासिल हुई तो कई सीरीज उन्होंने बराबरी पर खत्म की। निश्चित तौर पर उनकी आक्रामक क्षमता उन्हें हमेशा जीत नहीं दिला पाई जैसे 2004 में घरेलू मैदान पर आॅस्ट्रेलिया से 1-2 से सीरीज गवांई। लेकिन इन सबके बावजूद टीम रोमांचक, कल्पनाशील और खासतौर से दिलचस्प बन गई थी। गांगुली के कप्तानी के पद से हटने के बाद भी टीम में ‘बोल्ड’ फैसले लेने की परंपरा कायम रही। राहुल द्रविड ने उसी रणनीति को अपनाते हुए 1-0 की बढ़त का समर्पण करने से इंकार किया और इंग्लैंड के खिलाफ पहली टेस्ट सीरीज जीती। 2008 में सीरीज का तीसरा टेस्ट विवादास्पद रूप से हारने के बावजूद, अनिल कुंबले की कप्तानी में जब भारत पर्थ में मुकाबला जीता तो उसने बता दिया की भारतीय टीम कैसा टेस्ट क्रिकेट खेलती है? लेकिन इसके बाद टीम की कमान एमएस धोनी के हाथों में सौंप दी गई और जल्द ही ‘नियंत्रित आक्रमकता’ जैसे शब्द का इस्तेमाल बार-बार होने लगा।

जब सितारे बुलंदी पर होते तब भारत पारी की जीत के साथ पूरी सीरीज पर कब्जा कर लेता था। लेकिन जब वो हारते तब बहुत बुरी तरह हारते और परेशान करने वाली बात ये थी कि वो विरोधी टीम के सामने बिल्कुल भी चुनौती पेश नहीं कर पाते थे। इंडियन क्रिकेट टीम का शायद ही कोई ऐसा फैन होगा जो 2011 में हुई उस श्रृंखला को याद करना चाहेगा। उस साल इंग्लैंड ने भारत को धोबी पछाड़ देते हुए 4-0 से सीरीज अपने नाम की थी।

उसके बाद आया 2011 का आॅस्ट्रेलियन समर और यहां एक बार फिर आॅस्ट्रेलियाई टीम के हाथों 4-0 से क्लीन स्वीप झेलना पड़ा। उनके अंदर जीत की भूख खत्म हो चुकी थी और ड्राॅ की स्थिति तक पहुंचने से पहले ही वो मैच खत्म करना चाहते थे। ऐसा ही कुछ दिखा 2011 में वेस्ट इंडीज के खिलाफ तीसरे टेस्ट में, जहां भारतीय टीम को 47 ओवर में 180 रनों का लक्ष्य हासिल करना था। विकेट अच्छी नजर आ रही थी। चाय से पहले भारतीय स्कोर 94/3 था और 15 ओवर अभी भी बाकी थे। लेकिन धोनी ने मैच जीतने का प्रयास करने के बजाय मैच को ड्राॅ कराने का फैसला किया।

अगले चार सालों में पुरानी रणनितियों को अपनाने के बावजूद भारतीय टीम का प्रदर्शन विदेशी मैदानों पर सुधरा है और वहीं धोनी का विदेशों में टेस्ट जीत का प्रतिशत (20 प्रतिशत) सबसे कम है। विरोधी टीम के बैकफुट पर रहने के दौरान उनकी फील्ड पोजीशनिंग करने का तरीका सवालों के घेरे रहा है क्योंकि उनका लक्ष्य विकेट निकालने के बजाए रनों के प्रवाह को रोकने का होता है। कई लोगों द्वारा इसकी आलोचना की गई लेकिन धोनी ने अपने सिद्धांत पर ध्यान केन्द्रित किया ना कि परिणाम पर। ये प्रत्यक्ष था कि विराट कोहली जो कि 2012 में टीम के उप-कप्तान बने, उनकी जगह लेंगे। जब 2015 में आॅस्ट्रेलियाई दौरे के दौरान ऐसा हुआ तब इन दोनों ही खिलाड़ियों के अंदाज में बिल्कुल भिन्नता नजर आई। कप्तानी संभालने के बाद ही कोहली की रणनीतियों से ये जाहिर हो गया कि ये वो शख्स है जो जीत का इंतजार करने के बजाय उसे हासिल करने में विश्वास रखता है। इसका नमूना उन्होंने आॅस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टेस्ट में दिया जब उन्होंने बतौर कप्तान 364 के लक्ष्य का पीछा करते हुए 141 रनों की पारी खेली।

2015 में कप्तान के तौर पर उन्होंने विदेशी सरजमीं पर पहली टेस्ट सीरीज श्रीलंका के खिलाफ खेलते हुए 2-1 से जीत अपने नाम की। घरेलू मैदान पर उन्होंने ऐसा प्रदर्शन दिखाया जिसकी उम्मीद एक भारतीय कप्तान से की जाती है, उन्होंने दक्षिण अफ्रीका को 3-0 से करारी शिकस्त दी। श्रीलंका के खिलाफ पहला टेस्ट मैच हारने के बावजूद सीरीज अपने नाम कर लेना टीम इंडिया का एक सकारात्मक संकेत था। हाल ही में खत्म हुए वेस्ट इंडीज के दौरे से ये नजर आ रहा है कि दिल्ली के इस बल्लेबाज को अनिल कुंबले के रूप में बेहतरीन कोच और रणनीतिकार मिला गया है जिससे वो अपनी आक्रामकता साझा कर सकता है।

तीसरे टेस्ट के अंतिम दिन जब भारतीय टीम ने 300 से ज्यादा की बढ़त बना ली थी उस वक्त कोहली ने पारी घोषित करने का फैसला लिया। कोहली के इस निर्णय से साफ पता चलता है कि उनकी कप्तानी नतीजे की ओर केन्द्रित होती है। वेस्ट इंडीज के खिलाफ तीसरे टेस्ट मैच की दूसरी पारी में कोहली के पारी घोषित करने के निर्णय से ही पता चल गया था कि आने वाले वर्षों में भारतीय टीम की रणनीति क्या होगी।

217 पर 7 विकेट की स्थिति में भी भारत 400 से ज्यादा का टारगेट दे सकता था लेकिन कोहली ने शेष खेले जाने वाले ओवरों की संख्या पर ध्यान दिया। इस बात से ही पता चल जाता है कि उन्हें अपने गेंदबाजों पर कितना विश्वास है। मोहम्मद शमी और भुवनेश्वर कुमार ने अपना काम बखूबी करते हुए भारत के हाथों में वेस्ट इंडीज की धरती पर दूसरी टेस्ट सीरीज सौंपी। कप्तान के इस गेम प्लान ने उन सभी आलोचकों के मुंह पर ताला लगा दिया था जो दूसरे टेस्ट मैच के ड्राॅ होने के बाद सवाल उठाने लगे थे और साथ ही वो गांगुली की कप्तानी के दिनों की याद दिला गए थे।

खेल के प्रति वो जुनून न्यूजीलैंड के खिलाफ कानपुर में हुए पहले टेस्ट के दौरान भी दिखा। पहली पारी के दौरान जब अश्विन ने टाॅम लैथम को एलबीडब्ल्यू किया तब तुरंत ही कोहली ने रविन्द्र जडेजा के लिए सेकेंड स्लिप रखी और अश्विन की आॅफ स्पिन के लिए फाॅरवर्ड शाॅर्ट लेग रखा। इतना ही नहीं, अश्विन की गेंदबाजी के दौरान उन्होंने लेग स्लिप पर खिलाड़ी रखते हुए बल्लेबाज को सीधे बल्ले से खेलने पर मजबूर किया। ये ओवर कीवी बल्लेबाजों के लिए किसी भयानक सपने जैसा था जिसमें वो घुमावदार पिच पर अपने आप को संभालने के लिए जद्दोजहद करते नजर आए। केन विलियमसन जैसे तकनीकी बल्लेबाज अश्विन की बेहतरीन गेंदबाजी के आगे घुटने टेकते नजर आए। दो सत्र के अंदर ही न्यूजीलैंड की टीम 262 के स्कोर पर सिमट गई।

जोखिमभरा क्रिकेट खेलने का ये अंदाज भले ही हर बार सफल ना हो लेकिन ये सुनिश्चित करता है कि हम हार से ज्यादा जीत को अपने खाते में डालेंगे। सबसे अहम बात ये है कि भारतीय टीम जो टेस्ट क्रिकेट की नंबर एक टीम बनने की कगार पर है उसे टेस्ट क्रिकेट के महानतम एंबेस्डर के रूप में भी स्थापित करने की जरूरत है। टीम ऐसा आक्रामक क्रिकेट खेले जो पिछले दशक में अपराजय आॅस्ट्रेलियन टीम की बादशाहत की याद दिलाए। असल में उस टीम से बैटन आगे नहीं बढ़ पाई है और उस पर किसी की भी दावेदारी नहीं है। इस भारतीय टीम के पास उस दायित्व को लेने के लिए सारी खूबियां मौजूद है- एक आक्रामक कप्तान, माहिर तेज गेंदबाज, विश्व प्रसिद्ध स्पिन अटैक और एक आॅल-राउंडर।

वेस्ट इंडीज में मिली जीत ने एक नए युग की शुरूआत ऐसे वक्त में  की है जब भारतीय विदेशी दौरों से घबराने लगे थे। इसके साथ ही न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में मिली जीत ने उन टीमों तक पैगाम पहुंचाया है जो भारत दौरे पर आने वाली हैं। इस बदलाव ने टीम को मानसिक तौर पर मजबूती दी है जिसकी बहुत जरूरत थी। कुंबले के आगमन ने कोहली के अंदर मौजूद चिंगारी को हवा दी है। टेस्ट क्रिकेट में बेहतर समय हमारा इंतजार कर रहा है।

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