रणजी ट्राॅफीः कहीं लापरवाही की भेंट ना चढ़ जाए क्रिकेटर्स का लाॅन्चिंग पैड

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© BCCI Domestic Twitter

रणजी ट्राॅफीः कहीं लापरवाही की भेंट ना चढ़ जाए क्रिकेटर्स का लाॅन्चिंग पैड

रणजी ट्राॅफी सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं एक परंपरा है। इससे पहले की हमारी उपेक्षा इसका दम घोंट दे, इसे बचाना होगा। इसके अस्तित्व पर ही उठ रहे सवालों के जवाब जल्द से जल्द ढूंढने होंगे।

1991 में हुए रणजी ट्राॅफी में बाॅम्बे और हरियाणा के बीच खेले गए  फाइनल मैच की छाप उन सभी पर अमिट रूप से पड़ी जिन्होंने इसे देखा या इसके बारे में कहीं पढ़ा। ये एक ऐसा मुकाबला था जिसमें दोनों ही टीमों ने एक-दूसरे को अपना पलड़ा भारी करने का कोई मौका नहीं दिया और अंततः हरियाणा ने 2 रनों से रणजी ट्राॅफी के अब तक के सबसे रोमांचक मुकाबले को अपने नाम किया। मैच हारने के बाद दिलीप वेंगसरकर की असांत्वनीय रूप से रोने वाली छवि इस टूर्नामेंट के लंबे इतिहास में भावुक कर देने वाली तस्वीर के तौर में याद की जाती है।

25 साल के लंबे अंतराल के बाद, आज जब दुनिया क्रिकेट के सबसे छोटे प्रारूप टी20 को पसंद कर रही है, तब क्या आप एक ऐसे कप्तान के बारे में सोच सकते हैं जो एक रणजी मैच हारने पर अपनी भावनाओं पर काबू ना रख सका हो? शायद नहीं। एक ऐसी पीढ़ी जो टी20 क्रिकेट देखते हुए बड़ी हुई और जिन्होंने सफेद गेंद से खेलने वाले खिलाड़ियों को अपना रोल माॅडल बनाया है उनके लिए रणजी ट्राॅफी से अपने आप को भावनात्मक रूप से जोड़ पाना मुश्किल है। युवा महत्वकांक्षी खिलाड़ी इसे आईपीएल का काॅन्ट्रैक्ट हासिल करने की सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वहीं पत्रकारों के लिए ये कुछ मशहूर खिलाड़ियों के करीब आने और उनके साक्षात्कार लेने का जरिया है और वहीं दूसरी तरफ ये आम लोगों के लिए किसी भ्रम से कम नहीं है।

एक लंबे वक्त तक रणजी ट्राॅफी को एक ऐसा मंच माना जाता था जहां खिलाड़ी अपने हुनर की बदौलत भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने की उम्मीद करता था। लेकिन इंडियन प्रीमियर लीग के आगमन ने तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है आज देश की इन्हीं बड़ी घरेलू सीरीज को नजरअंदाज किया जा रहा है।

ये मौजूदा साल इसका बेहतरीन उदाहरण है। लोढ़ा कमेटी के साथ चल रही कानूनी लड़ाई में उलझे रहने के कारण बीसीसीआई तकरीबन रणजी ट्राॅफी के बारे में भूल ही चुकी थी, यही वजह रही कि रणजी ट्राॅफी के कार्यक्रम का ऐलान जुलाई के बजाय सितंबर में किया गया। इन सब के बावजूद 6 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस टूर्नामेंट के मुकाबले 11 जनवरी 2017 तक खेले जाएंगे। लेकिन एक बार फिर वही सवाल खड़ा होता है कि इस टूर्नामेंट की अहमियत क्या है?

घरेलू मैदान से मिलने वाले फायदे को कम करते हुए बीसीसीआई ने न्यूट्रल वेन्यू की अवधारणा को अपनाया है। ये एक सराहनीय कदम है कि कल्याणी, रांची और अहमदाबाद जैसी विकेट का चुनाव किया जा रहा है जहां नतीजे दो दिनों के भीतर ही मिल जाते हैं। लेकिन इस नई अवधारणा के अमल में आने से शायद रणजी ट्राॅफी को मिल रहा स्थानीय प्यार कम हो जाए। तो क्या बस यही एक तरीका है जिससे इस खेल के अच्छे दिनों को वापस लाया जा सकता था? क्या बीसीसीआई इन मुद्दों को सुलझाने के लिए एक समिति का गठन नहीं कर सकती थी? इसका सीधा-सा जवाब ये है कि इन सवालों का हल ढूंढने से पहले उन्हें एक प्रशंसक का नजरिया अपनाना होगा। कर्नाटक और मुंबई जैसी टीमों ने अपने घरेलू मैदान पर कई दफा जबर्दस्त प्रदर्शन करते हुए स्थानीय खेल प्रेमियों को इससे जोड़े रखा।

लेकिन एक और सवाल जो शायद इस वक्त का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या लोग वाकई ताबड़तोड़ क्रिकेट के इस दौर में अपने रणजी नायकों के प्रदर्शन को देखने के इच्छुक हैं?

जब आईपीएल का आगमन चमक-दमक और बड़े सितारों के साथ हुआ तब रणजी ट्राॅफी को घर के एक बुजुर्ग के तौर पर देखा जाने लगा। परिवार का एक ऐसा शख्स जिसकी सब इज्जत तो करते हैं लेकिन जिसके भविष्य की चिंता किसी को नहीं। इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने वाले बड़े खिलाड़ी भी रणजी ट्राॅफी से दूरी बनाते नजर आते हैं। ऐसे में प्रशंसकों के पास कोई बड़ी वजह नहीं है जिसके दम पर वो चिलचिलाती गर्मी में भी मैदान पर आकर घरेलू टीमों की भिडंत देखें।

ईएसपीएन क्रिकइंफो में लिखे एक काॅलम के जरिए पूर्व भारतीय ओपनर आकाश चोपड़ा ने रणजी मुकाबलों के दौरान दर्शकों की संख्या बढ़ाने के बारे में दिलचस्प सुझाव दिए।

वो लिखते हैं कि ‘‘हमें मार्केटिंग को और कारगर बनाने की जरूरत है। अब सभी रणजी मुकाबले सप्ताह के अंत में खेले जाने चाहिए। इसके साथ ही प्रवेश को निःशुल्क कर देना चाहिए जिससे लोगों को अपना दिन बिताने के लिए एक अच्छा विकल्प मिल सके। सबसे अहम बात की ये मुकाबले पूरे परिवार के लिए यादगार और मनोरंजक हो। ब्रेक के दौरान या फिर दिन का खेल खत्म होने के बाद मैच देखने आए बच्चों को मैदान पर जाकर खेलने की अनुमति देनी चाहिए। रनों की प्रतियोगिता करवानी चाहिए जिसमें खिलाड़ी भी शामिल हों। और ऐसे ही कई विचार हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है।’’

हालांकि ये विचार कल्पनाशील है जिन्हें हकीकत में लागू करना मुश्किल नजर आता है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ये एक रास्ता हो सकता है जो लोगों को रणजी मुकाबले देखने के लिए स्टेडियम तक लाने में कामयाब हो सके।

इस खूबसूरत खेल के प्रचारक रहे पत्रकार भी अब इससे अपना मोह खत्म कर चुके हैं। भारतीय घरेलू मैचों को कवर करने के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि ये खिलाड़ियों का सबसे पहले साक्षात्कार लेने का आसान जरिया है। साथ ही जहां आप अपने साथी पत्रकारों के साथ काॅफी की चुस्कियों का आनंद लेते हुए चर्चा कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि क्रिकेट हमें रोमांच दे रहा है पर अफसोस की बात ये है कि इसका रणजी ट्राॅफी के साथ रोमांस टूट चुका है।

आईपीएल जैसा टूर्नामेंट नेशनल टीम में खिलाड़ियों के चुनाव के लिए एक पैमाना बन चुका है जबकि फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में खिलाड़ियों के प्रदर्शन की अनदेखी हो रही है। लगातार दो साल तक बीसीसीआई से बेस्ट आॅलराउंडर का खिताब पाने वाले जलज सक्सेना आईपीएल की किसी भी टीम में जगह बनाने में कामयाब नहीं हो पाए। वहीं दूसरी तरफ आईपीएल में पवन नेगी और हार्दिक पांड्या को मिली अचानक सफलता ने उन्हें नेशनल टीम का हिस्सा बना दिया।

पूर्व भारतीय विकेटकीपर वीबी चंद्रशेखर ने ईएसपीएन क्रिकइंफो को दिए अपने इंटरव्यू में कहा ‘‘आज नौजवानों के पास एक शाॅर्टकट मौजूद है और आईपीएल उन्हें वही अवसर मुहैया करा रहा है। वो इस बात से वाकिफ हैं कि चयनकर्ताओं और मीडिया की नजरों में आने के लिए उन्हें व्यवस्थित ढंग से टूर्नामेंट खेलने की जरूरत है जिससे दुनिया की नजरें उन पर पड़े और आईपीएल उनके लिए उसी शाॅर्टकट का काम करता है।’’

रणजी ट्राॅफी की चमक अब पहले जैसी नहीं रही, इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि भारत के प्रमुख मुकाबलों में गिने जाने वाला ये टूर्नामेंट अब अपने न्यूनतम बिंदु पर आ चुका है, जहां इसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। अब स्टेकहोल्डर्स की बारी है कि वो अपनी भूमिका निभाए। अब भी ज्यादा देर नहीं हुई है। रणजी ट्राॅफी सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं एक परंपरा है। इससे पहले की ये उपेक्षा की शिकार होकर दम तोड़ दे इसे बचाना होगा।

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