एएफसी कप - भारतीय फुटबाॅल के लिए बेहद खास है बैंगलुरू एफसी की जीत

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एएफसी कप - भारतीय फुटबाॅल के लिए बेहद खास है बैंगलुरू एफसी की जीत

आई-लीग की मौजूदा चैंपियन बैंगलुरू एफसी ने एएफसी कप के सेमीफाइनल में जगह बना ली है। डेम्पो और ईस्ट बंगाल की सफलता को दोहराते हुए यह तीसरी भारतीय टीम बनी। क्या बैंगलुरू एफसी की टीम वैसी ही छाप छोड़ पाएगी?

ठ साल पहले होम यूनाइटेड पर डेम्पो को मिली रोमांचक जीत भारतीय फुटबाॅल के इतिहास में एक यादगार लम्हा था और ऐसे लम्हे हाल के समय में बहुत कम आए।

अब तक डेम्पो के अलावा दो और भारतीय क्लब एएफसी कप के सेमीफाइनल में जगह बनाने में कामयाब हो पाई है जबकि ईस्ट बंगाल और महिंद्रा यूनाइटेड जैसे क्लब ऐसा करने में नाकामयाब रहे। 2003 आसियान क्लब चैंपियनशिप में ईस्ट बंगाल को मिली जीत के बाद ये भारतीय फुटबाॅल की एक बड़ी कामयाबी थी।

डेम्पो टीम के प्रमुख स्तंभ बेहतरीन डिफेंडर महेश गावली रहे जो पिछले एक दशक तक भारत के लिए खेले। वहीं इस सूची में समीर नायक का नाम भी है जो 37 की उम्र में भी क्लब के साथ जुड़े हुए हैं। क्लिफोर्ड मिरांडा, क्लाइमेक्स लाॅरेंस और उनके साथ आई-लीग में खेले अब तक के दो सबसे बेहतरीन विदेशी खिलाड़ी बेटो और रेंटी मार्टिन्स ने भी टीम को मजबूती दिलाई है। पिछले कुछ समय में भारतीय फुटबाॅल क्लब में ये एक शानदार खिलाड़ियों का समूह रहा है। इसके साथ ही इसे आई-लीग के इतिहास में कई लोगों ने सर्वश्रेष्ठ टीम माना है।

बेटो ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने साक्षात्कार में उस टीम को याद करते हुए कहा कि ‘‘भारतीय फुटबाॅल में ऐसी टीम फिर कभी देखने को नहीं मिलेगी। कभी नहीं।’’

डेम्पो की टीम के मजबूत खिलाड़ियों ने भारतीय राष्ट्रीय टीम को भी सुसज्जित किया और 1962 के एशियाई खेलों में मिले स्वर्ण के बाद एएफसी चैलेंज कप को जीत कर एक बड़ी सफलता दिलाई। अंडर-23 टीम ने सैफ खिताब अपने नाम कर उस साल को भारतीय फुटबाॅल के लिए एक यादगार साल बना दिया।

आदर्श नजरिए से देखा जाए तो यह समझ में आएगा कि एक फुटबाॅल क्लब अपना काम किस तरह करता है। क्लब को मिली जीत नेशनल टीम को प्रोत्साहित करती है। हाल ही में देखें तो बार्सिलोना की जीत ने स्पेन को वर्ल्ड कप जीतने में मदद की, तो वहीं बायर्न म्यूनिख की जीत की बदौलत जर्मनी की टीम वर्ल्ड कप घर लाई। इन दोनों ही कहानियों में एक समानता नजर आती है, इन्होंने क्लब टीम के मजबूत खिलाड़ियों को सफलतापूर्वक नेशनल टीम का हिस्सा बनाया। 2008 में पहली बार आयोजित हुए आई-लीग का खिताब जीतने वाली डेम्पो ने भी कुछ इसी तरह से तरह से प्रभाव छोड़ा था।

आई-लीग की मौजूदा चैंपियन बैंगलुरू एफसी ने एएफसी कप के सेमीफाइनल में जगह बना ली है। डेम्पो और ईस्ट बंगाल की सफलता को दोहराते हुए यह तीसरी भारतीय टीम बनी। क्या बैंगलुरू एफसी की टीम वैसा ही प्रभाव डाल पाएगी?

55 साल पहले वजूद में आए क्लब के साथ तीन साल पहले बने क्लब की तुलना करना हास्यास्पद लग सकता है। हालांकि एशिया की सेकंड-टायर क्लब मुकाबले को छोड़ दिया जाए तो दोनों में कुछ खास बातें हैं जो मिलती-जुलती हैं। डेम्पो के साथ-साथ चर्चिल ब्रदर्स और सलगांवकर ने मिलकर भारतीय फुटबाॅल को जो कोलकाता क्लब तक ही सीमित रह गया था वहां से निकालकर उसके अस्तित्व का और विस्तार किया और अब यही जिम्मेदारी बैंगलुरू एफसी निभा रही है।

डेम्पो ने क्लब के प्रबंधन की एक नई परिभाषा दी और साथ ही उन्होंने मैदान पर फुटबाॅल का एक नया रूप विकसित किया। उस दौर में जब क्लब विदेशी खिलाड़ियों पर पैसा लगा रहे थे और टीम में लगातार बदलाव कर रहे थे, डेम्पो ने उस समय अपनी टीम के साथ मजबूत स्थिरता दिखाई। 2005 से 2011 के बीच उन्होंने लगभग एक ही टीम बनाए रखी और उसी टीम के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण खिताब जीतें, जिनमें पांच लीग टाइटल (2 नेशनल फुटबाॅल लीग टाइटल और 3 आई-लीग खिताब), 1 डूरंड कप, 2 इंडियन सुपर कप और एएफसी कप के सेमीफाइनल में ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज करना शामिल है।

भारतीय फुटबाॅल में डेम्पो की तरह ही बैंगलुरू एफसी एक ताजी हवा के झोंके की तरह आई है। अपनी स्थापना के बाद छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने दिखा दिया की अगर उन्हें सही देखरेख और निवेश मिले तो एक भारतीय क्लब क्या हासिल कर सकती है। ये एक ऐसी टीम है जो उन खिलाड़ियों को मिलाकर तैयार की गई थी जिन्हें आई-लीग के दूसरे क्लबों ने अपनी टीम में जगह देने से मना कर दिया था। आज वही टीम आई-लीग के इतने खिताब अपने नाम कर चुकी है जितने मोहन बगान और ईस्ट बंगाल ने मिलकर भी नहीं जीते। इस क्लब की स्थापना एक ऐसे शहर में हुई, जहां हिन्दुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड और इंडियन टेलिफोन इंडस्ट्री जैसे बड़े क्लब पहले से ही मौजूद थे। लेकिन उसमें खेल के प्रति वो जुनून, पागलपन और गंभीरता नहीं थी जो पश्चिम बंगाल और गोवा के खेल में नजर आता था। मगर ये गौर करने वाली बात है कि केवल तीन साल पहले ही बने इस क्लब ने भारतीय फुटबाॅल में शानदार उपस्थिति दर्ज कराई है और ऐसा क्लब बना है जिसके समर्थकों का हल्ला दूर तक सुना जा सकता है।

आखिर इसके पीछे का राज क्या है? दरअसल इस टीम के मैनेजमेंट के लिए 70 या 80 के दशक का तरीका नहीं अपनाया गया। क्लब इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थी की सोशल मीडिया के जरिए प्रशंसकों को कैसे करीब लाया जा सकता है। इस क्लब ने ये सुनिश्चित किया की इसके खिलाड़ी अलग-अलग सेशन के जरिए लोगों से रूबरू हो सके। उन्होंने प्रशंसकों को ओपन ट्रेनिंग सेशन के लिए आमंत्रित किया। इससे फैन्स भी इस टीम के साथ जुड़ाव महसूस करने लगे। उन्होंने इस बात पर खासा ध्यान दिया कि स्टेडियम में आए उनके समर्थक सिर्फ दर्शक बनकर ना रह जाए। उनके प्रोत्साहित करते नारे हों या बैनर या फिर बस की खुली छत पर जश्न मनाने का तरीका, बैंगलुरू एफसी ने एक ऐसी मिसाल रखी है जिसे दूसरे क्लबों को भी अपनाना चाहिए।

हालांकि, डेम्पो और बैंगलुरू की जीत भारतीय फुटबाॅल के अलग-अलग दौर में आई। डेम्पो ने एएफसी कप के सेमीफाइनल में अपनी उपस्थिति उस समय दर्ज कराई थी जब आई-लीग का उद्घाटन हुआ था और भारतीय फुटबाॅल में ये एक आशा की किरण थी। नेशनल फुटबाॅल लीग अपना काम नहीं कर पाई लेकिन ये माना जा रहा था कि कम से कम व्यवसायिक रूप से आई-लीग अपना काम करेगी। 24 नवंबर 2007 में हुए आई-लीग के पहले मैच में जब डेम्पो सलगांवकर के विरूद्ध मैदान में उतरी तो इसे भारतीय फुटबाॅल के नए युग की सुबह माना गया। नौ साल बाद ये लीग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए मशक्कत कर रही है, जिसमें वो लगातार असफल होती दिख रही है।

आईएसएल का आगमन सभी को भा रहा है। ये उस नन्हे पौधे की तरह है जिसे सभी पसंद कर रहे हैं और उसकी देखभाल कर रहे हैं। यहां तक की आई-लीग भी उसके संरक्षण में आगे आ रहा है। बड़े-बड़े क्लब अपना काम बंद कर रहे हैं और लीग से अपना समर्थन वापस ले रहे हैं। अब इस बात पर भी संदेह है कि आई-लीग को आयोजित करने के लिए पर्याप्त टीमें होंगी या नहीं। ऐसे समय में ये बताना मुश्किल है कि बैंगलुरू की सफलता भारतीय फुटबाॅल में कब तक जिंदा रह पाती है।

इसमें सबसे उपयुक्त स्थिति यह है कि एआईएफएफ को यह याद दिलाया जाए कि यदि आई-लीग क्लबों को सही देखरेख मिले तो वो कई बड़ी कामयाबी हासिल कर सकते हैं। फुटबाॅल के खेल को कामयाब बनाने के लिए उसे स्टारडस्ट अवाॅर्ड फंक्शन में बदलने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। भारतीय फुटबाॅल में आई-लीग क्लब उंचे स्थान के हकदार हैं, उनके साथ दोगला और पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए।

बुरी से बुरी परिस्थिति में भी ये बात तो तय है कि इस सत्र में भारतीय फुटबाॅल की जटिल स्थिति सुलझी है, बेहतर हुई है और इसे इस सत्र के संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए।

क्या इस मुकाबले का अनुमान लगाना आसान है? शायद नहीं, मगर एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि 19 अक्टूबर की रात को जब मौजूदा चैंपियन मलेशिया की जोहोर दारूल ताजिम बैंगलुरू के खिलाफ सेमीफाइनल में उतरेगी तो यह एक यादगार रात होगी। कागज पर बैंगलुरू की टीम कमजोर नजर आती है। कागजों पर ये उसी तरह असफल दिखती है जैसे 2008 में लेबनान क्लब अल-सफा के सामने डेम्पो हारी थी और 2013 में उस वक्त के मौजूदा चैंपियन अल-कुवैत से ईस्ट बंगाल को शिकस्त मिली थी। बैंगलुरू को कुछ ऐसे खास कदम की जरूरत है जो उसे फाइनल की दहलीज तक ले जा सके। जब वो जोहोर के खिलाफ खेलने उतरेंगे तब केवल उनकी जीत ही दांव पर नहीं होगी बल्कि वो आई-लीग और उसके क्लबों के भविष्य के लिए भी खेलेंगे।

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