क्या पेप गार्डियोला केवल शीर्ष क्लबों के प्रबंधन का ही श्रेय पाने के हकदार हैं?

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क्या पेप गार्डियोला केवल शीर्ष क्लबों के प्रबंधन का ही श्रेय पाने के हकदार हैं?

इस साल फरवरी में एतिहाद स्टेडियम में गार्डियोला के नाम की घोषणा हुई तब कई लोग इससे बेहद उत्साहित हुए की प्रीमियर लीग में एक कुशल रणनीतिज्ञ के हाथों में बागडोर सौंपी जा रही है। वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने चैन की सांस ली। इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि गार्डियोला के सामने काफी चुनौतियां हैं।

‘‘उस टीम के खिलाफ तो मेरे दादाजी भी बुंदेसलीगा जीत सकते थे।’’

‘‘पेप ने बार्सा को नहीं बल्कि मेसी ने बार्सा को पहचान दिलाई।’’

‘‘उन्हें काबिल खिलाड़ी नहीं चाहिए, उन्हें तो ऐसे खिलाड़ी चाहिए जो उनसे डरें और उनके कहे अनुसार चले।’’

से ताने सिर्फ याया टूरे के कुख्यात एजेंट दिमित्री सेलुक ने ही नहीं कहे बल्कि कई मशहूर हस्तियों ने भी कहे हैं। इनका मकसद आधुनिक समय के महानतम कोच में से एक गार्डियोला के कद को कम करना है।

इस साल फरवरी में एतिहाद स्टेडियम में गार्डियोला के नाम की घोषणा हुई तब कई लोग इससे बेहद उत्साहित हुए की प्रीमियर लीग में एक कुशल रणनीतिज्ञ के हाथों में बागडोर सौंपी जा रही है। वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने चैन की सांस ली। इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि गार्डियोला के सामने काफी चुनौतियां हैं।

7 महीने के छोटे अंतराल के दौरान ही 45 साल के पेप गार्डियोला ने शानदार ढंग से अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। आंकड़ों की बात करे तो गार्डियोला ने अपने नए क्लब के साथ 10 मैच खेले और सभी में जीत हासिल करते हुए अपना सौ प्रतिशत दिया है। मैनचेस्टर सिटी ने पेप की अगुवाई में इससे बेहतर शुरूआत की उम्मीद ही नहीं की होगी। आखिर गार्डियोला ने इतने कम समय में पहले से ही मजबूत टीम की, जीत के लिए भूख कैसे बढ़ा दी? कैसे उन्होंने इस टीम को जीत का पर्याय बनाया? क्या वो सिर्फ इस टीम के लिए लकी साबित हुए हैं? या फिर इस जीत का सेहरा टीम को जाता है? या फिर टीम की बेइंतहा संपत्ति इसका कारण है? या फिर वाकई वो एक टाॅप-क्लास मैनेजर बनने का माद्दा रखते हैं?

2008 में, अनुभवी और अच्छे ट्रैक रिकाॅर्ड वाले पर विवादों से घिरे रहने वाले जोस मोरिन्हो को दरकिनार कर 37 साल के युवा गार्डियोला को बार्सिलोना का मैनेजर नियुक्त किया गया। उसके बाद क्या हुआ, इसके लिए एक अलग आलेख लिखना पड़ेगा। 4 सीजन और 14 ट्राॅफी। इस बेमिसाल कामयाबी ने गार्डियोला को फुटबाॅल जगत का मैनेजर बनाया तो वहीं बार्सिलोना को टाॅप फुटबाॅल क्लब। पर इस बीच सभी ने प्रश्न उठाए कि गार्डियोला को हमेशा बेहतरीन खिलाड़ियों की टीम मिली है इसलिए क्लब की कामयाबी में उनकी भूमिका नाममात्र है। ऐसा करना बहुत गलत है।

The world has never seen anything quite like it. -Sir Alex Ferguson on Pep's Barca

क्लब के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को देखा जाना चाहिए और साथ ही उसकी सराहना की जानी चाहिए। फ्रेंक रिकार्ड की अगुवाई में लगातार दो साल टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई, टीम से कुछ खिलाड़ियों की विदाई की गई जिसमें से अहम नाम ब्राजीली खिलाड़ी रोनाल्डीन्हो और डेको का था। पेप को लगा कि इनकी पार्टी और मौज-मस्ती वाली जीवनशैली टीम के बाकि खिलाडियों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है, इस वजह से उन्होंने इन दोनों खिलाड़ियों को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस बीच उन्होंने सेड्यू केटा, दानी आल्वस, पिन्टो और गैरार्ड पिक्यू जैसे खिलाड़ियों को टीम से जोड़ कर समझदारी वाला कदम उठाया। लेकिन 20 साल के खिलाड़ी सर्जियो बसकिट्स को सीधे मुख्य टीम का हिस्सा बनाना हैरान करने वाला था। गार्डियोला एक ऐसे इंसान है जिन्हें परफेक्शन से कम कुछ भी मंजूर नहीं। उनके दिमाग में अपनी टीम को लेकर एक साफ तस्वीर मौजूद है और जब तक वो अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर लेते तब तक वो चैन की सांस नहीं लेते हैं। उन्होंने सर्जियो के साथ बी-टीम में काम किया है और वो इस बात से वाकिफ हैं कि ये खिलाड़ी सीनियर टीम में एक अहम भूमिका निभा सकता है। गार्डियोला की सबसे खास बात ये है कि उन्होंने उच्चतम स्तर तक एक पेशेवर खिलाड़ी के तौर पर खेला है। गार्डिओला को मशहूर जोहान क्राइफ ने तराशा है जिसका परिणाम है कि गार्डिओला के बार्सा को खेलना असंभव-सा लगता है। दुनिया ने ऐसी चीज कभी नहीं देखी और जब ऐसी बातें सर एलेक्स फग्र्युसन खुद कहें तो फिर इसे बड़ी गंभीरता से लेना चाहिए।

ज्लाटन के साथ उनके रिश्ते को अगर दरकिनार कर दिया जाए तो क्लब के साथ उनका अनुभव काफी अच्छा रहा है। 2012 में क्लब से अलग होने पर वो क्लब के मशहूर इतिहास में सबसे सफल मैनेजर में से एक रहे। अपने कड़े मेहनत वाले इस दौर के खत्म होने के बाद उन्होंने एक साल का ब्रेक लिया। अब अगला पड़ाव बायर्न म्यूनिख का था। जप हैकन्स के साथ 2012-13 में बायर्न ने तिहरे खिताब जीते थे यही वजह रही की एक साल के अंतराल के बाद आए गार्डियोला के लिए ये एक चुनौतीपूर्ण स्थिति थी। आप बेस्ट टीम को और बेहतर नहीं बना सकते लेकिन आने वाले मुकाबलों के लिए उसकी उसी फाॅर्म को बनाए रख सकते हैं। सारा दबाव गार्डियोला पर था जब उन्होंने जर्मनी में कदम रखा। कई लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि वो अपनी टीम के ट्रेनिंग सेशन में कितना वक्त बिताते हैं। वो सही मायनों में एक ‘कोच’ है। उन्होंने वाकई दुनिया के मशहूर खिलाड़ियों का मार्गदर्शन किया है और उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है। उनकी इस कोशिश ने टीम को बड़े पैमाने पर फायदा पहुंचाया। उसके बाद बारी आती है रणनीति की। गार्डियोला उन चुनिंदा प्रबंधकों में से एक थे जिनमें खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करने, रणनीति बनाने और अपने दल के सदस्यों को प्रबंधित करने के सारे गुणों का सही समावेश था। बतौर मैनेजर आपको कुछ कड़े निर्णय लेने होते हैं और इसका एहसास पेप गार्डियोला को था। रणनीति के तौर पर उन्होंने खेल के एक साधारण से तरीके को बड़ी खूबसूरती से अपनाया। खिलाड़ियों को उन्होंने सिखाया की गेंद अपने पास रखें, फाॅरवर्ड को दें, अपना अधिकार क्षेत्र न खोएं अगर ऐसा हो भी जाए तो कोशिश करें की विरोधी टीम उस पर ज्यादा देर तक कब्जा ना कर सके। टीम के खिलाड़ियों द्वारा अपनाए गए खेल के इस मूलभूत तरीके ने गार्डियोला के आदर्श की बुनियाद को मजबूत बनाया।

बायर्न में भी उन्होंने उन खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाया जो उनके पैमाने पर खरे नहीं उतर पाए। उन्हें दोबारा ऐसे खिलाड़ी मिले जो उनके अनुरूप प्रदर्शन कर सकते थे। मारियो गाॅट्ज और थिगो आल्कटारा को वो क्लब में लेकर आए। वो कभी भी ऐसे मैनेजर नहीं रहे जो बड़े नाम वाले खिलाड़ियों के पीछे भागते हो। ये एक शर्म की बात है कि जर्मन क्लब के साथ बिताए गए उनके समय को केवल इसलिए ‘‘असफल’’ माना गया क्योंकि वो चैंपियंस लीग नहीं जीत पाए। वो बड़े आराम से हर सेशन में लीग को अपना कर सकते थे। वो हर बार चैंपियंस लीग के सेमी-फाइनल तक पहुंचे हैं मगर अफसोस साइमन की एटलेटिको मैड्रिड के खिलाफ उनका आखिरी सीजन थोड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रहा। 3 सीजन में 7 ट्राॅफी पाना अपने आप में शानदार है और ये उपलब्धि उनसे कोई नहीं छीन सकता है। फिर भी फुटबाॅल के प्रशंसकों में ये भावना थी कि गार्डियोला खुशनसीब है की उन्हें दो बेहतरीन टीमों के साथ काम करने का मौका मिला। मगर हकीकत ये है की उन्होंने दोनों ही टीमों को अपने खास स्टाइल और विचार से रूबरू कराया। निसंदेह, ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो पेप की रणनीति और उनके कौशल की सराहना करते हैं। 21 ट्राॅफी जीतने के बाद भी लोगों को यही लगता है कि उन्हें बेहतर चुनौती दी जानी चाहिए थी। प्रीमियर लीग से बेहतर चुनौती क्या हो सकती है?क्या पेप गार्डियोला केवल शीर्ष क्लबों के प्रबंधन का ही श्रेय पाने के हकदार हैं?

2015-16 के बचे हुए सत्र और आने वाले सीजन के लिए उन्हें मैनचेस्टर सिटी में मैनुअल पेलेग्रिनी के उत्तराधिकारी के तौर पर लाया गया। इस खबर ने मीडिया और प्रशंसकों में उत्सुकता बढ़ा दी है। जानकार इस बात से हैरान हैं कि प्रतिस्पर्धात्मक फुटबाॅल के प्रारूप प्रीमियर लीग को गार्डियोला ने इतनी जल्दी कैसे अपना लिया। इतना ही नहीं इसमें अपने तौर-तरीकों को कामयाब तरीके से लागू भी किया।

लेकिन कुछ बड़े प्रबंधकों के विपरीत पेप रणनीति के मामले में कहीं ज्यादा लचीले हैं। वो मुकाबले की प्रकृति और उसकी अहमियत को ध्यान में रखते हुए टीम तैयार करते हैं। कई बार वो खेल के बीच में टीम के स्कोर के आधार पर अपनी रणनीति में फेरबदल करते हैं। लेकिन ज्यादातर वो विपक्षी टीम और उसकी रणनीति के अनुसार अपना दांव चलते हैं। जिस भी मुकाबले की जिम्मेदारी उनके कंधों पर होती है, वहां वो इन सभी कारकों पर ध्यान देते हैं। वो लगातार फाॅर्मेशन में बदलाव करते रहते हैं और टीम के बेहतरीन खिलाड़ियों को दूसरी किसी भी पोजीशन पर आकर खेलने का निर्देश देते हैं। वो टीम में बड़ा फेरबदल करने से नहीं घबराते हैं। खिलाड़ी उनके निर्देशों का पालन करने में इसलिए कामयाब हो पाते हैं क्योंकि ऐसा ही अनुभव उन्हें ट्रेनिंग के दौरान मिलता है। पेप के पास अच्छे खिलाड़ी है जिन्हें वो बेहतरीन बनाता है। टीम में कई स्टार खिलाड़ी मौजूद है लेकिन वो सुनिश्चत करते हैं की मैदान पर वो एकजुट होकर खेलें।

एतिहाद में आने के बाद उन्होंने बिल्कुल भी समय बर्बाद नहीं किया और साफतौर पर बता दिया कि लोगों के मनपसंद खिलाड़ी जो हार्ट को क्लब में रखने की जरूरत नहीं है। अपने खेल की परिभाषा देते हुए उन्होंने बता दिया की उन्हें एक ऐसे गोलकीपर की जरूरत है जिसका फुटवर्क बहुत अच्छा हो इसलिए हार्ट उस जगह के लिए उपयुक्त नहीं थे। याया टूरे की स्थिति हमेशा ही अच्छी नहीं रही क्योंकि पेप ने युवा सर्जियो को बार्सिलोना के रक्षात्मक मिडफील्ड के मुख्य खिलाड़ी के तौर पर चुना था। उनकी शख्सियत वैसी थी जिसे गार्डियोला पसंद नहीं करते थे। उन्हें हमेशा ही ऐसे खिलाड़ियों का समूह चाहिए था जो कि एकजुट रहे और अपने आप को टीम का हिस्सा माने। पेप के साथ या तो टीम की सख्त नीतियों को अपनाओ या फिर टीम छोड़ कर चले जाओ। गार्डियोला ने एक बार फिर अपने खेल के अनुसार खिलाड़ियों को साइन किया। इल्के गन्डोगेन, लिराॅय सेन, जाॅन स्टोन्स और नोलीटो जैसे खिलाड़ियों को टीम में लेने से टीम और भी मजबूत हुई है। मैनचेस्टर सिटी के गोलकीपर की भूमिका के लिए पेप ने जो पैमाना रखा था उसमें क्लाॅडियो ब्रावो पूरी तरह से फिट नजर आते हैं।

नतीजे किसी से भी छिपे नहीं है। हाल के समय में देखें तो मैनचेस्टर सिटी ने अपने अभियान को एक तेज शुरूआत दी है। गार्डियोला की सरपरस्ती में रहीम स्अर्लिंग, केविन डे ब्रुएन और सर्जियो ओगेरो जैसे अच्छे खिलाड़ी भी अपनी बुलंदियों पर पहुंचना चाहते हैं। आप उनके लिए खेलो, उनकी सलाह सुनो, उनके विचार को मानो तो वो आपके साथ बेहतर ढंग से पेश आएंगे और अगर आप उनकी विचारधारा मानने से इंकार कर देते हैं तो वो आपको अपने आप से दूर कर देते हैं। मौजूदा वक्त में मैनचेस्टर सिटी को हरा पाना मुश्किल नजर आ रहा है। ऐसी टीम का प्रदर्शन देखने के लिए प्रशंसक भी काफी उत्सुक रहते हैं।

उन्होंने जैसा सोचा था ठीक उसी तरह अपने सीजन की शुरूआत की। लेकिन उनसे ये उम्मीद की जाती है कि समय के साथ वो अपना प्रदर्शन और भी बेहतर बनाएंगे। गार्डियोला के कार्यकाल के कारण इस टीम को इंग्लैंड की घरेलू टीम के ठप्पे से छुटकारा मिला और इसका विस्तार यूरोप में हुआ। इन सब का श्रेय सिर्फ एक ही शख्स को जाता है।

शुरूआत में मैंने पेप की संभावित सफलताओं पर कई सवाल किए थे लेकिन अब उनकी कामयाबी के बाद उन सभी प्रश्नों पर विराम-चिन्ह लग गए।

तो क्या वो असल में टाॅप-क्लास मैनेजर कहलाने की काबिलियत रखते हैं?

हां।

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