एक प्राचीन खेल का उदय- कबड्डी

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Image Courtesy: © Facebook - PKL

एक प्राचीन खेल का उदय- कबड्डी

अंग्रेजों ने 1947 में भारत छोड़ने के साथ बहुत कुछ पीछे छोड़ा था- लुटयेंस, राष्ट्रपति भवन, रेलवे, और साथ ही शैक्षिक और सामाजिक बदलाव। परन्तु उनका प्रभाव केवल वहीँ तक सीमित नहीं रहा बल्कि खेलों पर भी पड़ा। उन्होंने भारत में एक खेल का सूत्रपात किया जो भद्रपुरुषों का खेल यानि जेंटलमेन्स गेम के तौर पर आया परतु जल्दी ही वह खेल भारत के सभी गली कूचों में किशोरों द्वारा खेला जाने लगा। समय के साथ क्रिकेट हर भारतीय नागरिक का दूसरा धर्म बन गया।

परन्तु क्रिकेट के हमारी गलियों और उसके बाद हमारे दिलों तक पहुँचने से पहले एक और भारतीय खेल था जो हमें एक करता था, जो हाथों से हाथ जोड़ने के लिए प्रेरित करता था, जो विरोधी दलों और गांवों के बीच सम्बन्धों को मजबूत करता था। एक खेल जो हमें मिट्टी की महक याद कराता था और एक ही शब्द बार बार कहलवाता था- कबड्डी, कबड्डी, कबड्डी!

इस प्राचीन खेल की उत्पत्ति महाकाव्यों के समय से हुई है। हालांकि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि यह खेल सही मायनों में कब अस्तित्व में आया, यह माना जाता है कि यह खेल महाभारत काल का हिस्सा रहा है। इतिहास के अनुसार कबड्डी की उत्पत्ति तमिल शब्द “कई-पीडी”, जिसका अर्थ “हाथ पकड़ना”, से हो सकती है। तथापि मिलते जुलते पर्याय के शब्द उत्तर भारत में भी विद्यमान थे। एक तरह का खेल जिसको, हु-तू-तू कहा जाता था, पश्चिमी भारत में खेला जाता था, वैसे ही पूर्वी क्षेत्र में हा-डो-डो और दक्षिण भारत में चेडूगुडू में खेला जाता था जो कबड्डी के पूर्वकालिक प्रारूप के तौर पर पाए गए हैं। जैसे कि कबड्डी एक ग्रामीण खेल है, इसको अपने क्षेत्र की रक्षा की अतिप्राचीन अवधारणा से उत्पन्न माना जा सकता है।

भले ही कबड्डी के कई प्रारूप मौजूद हैं जैसे कि गामिनी, अमर, संजीवनी और पंजाबी, परन्तु अंतर्राष्ट्रीय प्रारूप में 7-7 खिलाडियों की दो टीमें होती हैं जो 20-20 मिनट के दो भागों में एक दूसरे से मुकाबला करती हैं और विजेता का निर्णय अर्जित किये गए अंकों के आधार पर होता है। कबड्डी हमारी संस्कृति का अंग होने के कारण और पुराने समय में भारत की एशियाई खेलों और विश्व कप में विजय के कारण काफी लोकप्रिय रहा है।

हालांकि ताकत के इस खेल की लोकप्रियता 1980 के आरंभ के साथ घट गयी जब 1983 में क्रिकेट विश्व कप में विजय ने बाकी सभी खेलों को दबा दिया। जब अधिकतर युवा क्रिकेट की ओर आकर्षित हो कर बल्ला उठा रहे थे, कबड्डी को फिर से ग्रामीण क्षेत्रों में ही शरण मिली। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं था कि बहुत से किशोरों को इस खेल के इतिहास और लोकप्रियता के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था।

परन्तु वह क्या है जो एक खेल को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है?

खिलाडियों और रोमांच के अलावा, मीडिया और सोशल मीडिया आज के समय में किसी भी खेल को आसानी से उठा और गिरा सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय अनावरण और धन के अलावा, ‘इडियट बॉक्स’ के आगमन ने क्रिकेट को आसमान में उठा दिया। खेल के हमारे घरो में प्रवेश के साथ ही प्रचारों ने और कंपनियों ने अनुकूलता का अनुगमन करते हुए क्रिकेट को दूसरे ही स्तर पर पहुंचा दिया जिसमे बाकी खेल पीछे छूट गए। क्रिकेट एक पूरा साल चलने वाला खेल बन गया जिसका अर्थ था अधिक मुकाबले, अधिक अनुभव और अधिक धन खेल प्राधिकरणों के खाते जाने लगा।

बिना मीडिया और टेलीविज़न की व्याप्ति के, कबड्डी जो क्रिकेट के विरूद्ध लोकप्रियता की लड़ाई हार गया था। यह खेल केवल फुर्सत में खेला जाने वाले खेल बन कर रह गया था। हालात ऐसे थे कि लोगों को 1983 क्रिकेट विश्व कप की विजय 2010 में भी याद थी जिसका वो जश्न मना रहे थे, परन्तु कबड्डी में जो उपलब्धियां भारत ने प्राप्त की थीं उनका ज्ञान किसी को भी नहीं था।

IPL के प्रारंभ के बाद यह निश्चित हो गया कि लोकप्रियता के मामले में कोई और खेल क्रिकेट को नहीं पछाड़ सकता था। धन, लोकप्रियता, प्रशंसक सब क्रिकेट के साथ थे। परन्तु IPL के आगमन से उसी प्रारूप को दूसरे खेलों में लागू करने के रास्ते भी खुले थे।

समय बदलना ही था और वह बदला। क्रिकेट की 24x7 प्रसारण ने लोगों को इस से दूर कर दिया और यह कम लोकप्रिय खेलों के लिए प्रकाश में आने का अच्छा मौका था। हालांकि, किसी भी खेल का भव्य आगमन करना सरल नहीं था। कुछ ही वर्षों में देश में हर खेल के लिए पेशेवर लीग शुरू हो गयी।

लीग की उसी बाढ़ में प्रो-कबड्डी लीग भी आई। योजना इंडियन प्रीमियर लीग से ही मिलती जुलती थी। उसी तरह की निजी स्वामित्व वाली टीमें और नीलामी। प्रारंभिक अडचनों के बाद प्रायोजकभी आ गए। परन्तु कोई भी टेलीविज़न पर एक ग्रामीण खेल की सफलता के बारे में निश्चित नहीं था।

क्या लोग इस खेल को अपनाएंगे? क्या यह मनोरंजक होगा? और इनमें सबसे बड़ा सवाल- क्या इस से पैसा आएगा? सभी प्रश्न जायज़ थे, परन्तु इस खेल की शक्ति ने दो सीजन में अपार सफलता प्राप्त कर इन सभी प्रश्नों के उत्तर दे दिए।

बड़े प्रसारकों और बड़े प्रायोजकों के लीग को समर्थन देने से कबड्डी की लोकप्रियता बढ़ी है और यह एकदम से यह खेल उठ खड़ा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रो-कबड्डी लीग के दर्शकों की संख्या 2014 के मुकाबले 2015 में 54 प्रतिशत बढ़ी है। उसके अलावा, उद्घाटन के समय दर्शकों की संख्या 435 मिलियन थी जो कि IPL के बाद दूसरे नंबर पर था जिसकी उद्घाटन के समय दर्शकों की संख्या 560 मिलियन थी।

दर्शकों की संख्या का मतलब है अधिक फैलाव। लोकप्रिय होने के लिए फैलाव आवश्यक है। आज के समय में , अगर वो आपके सामने नहीं है तो वह आपके दिमाग से भी निकल जाएगा। 2014 और 2015 के दो सफल सीजन के बाद, आयोजको ने खेल की बढती लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए इसे साल में दो बार करवाने के निर्णय लिया। ‘ले पंगा’ का एक और सत्र आने वाला है, अधिक समय नहीं लगेगा जब अनूप कुमार, अजय ठाकुर और राहुल चौधरी जैसे नाम हर जगह आम हो जायेगे। परन्तु इस बढती हुई लोकप्रियता के साथ शायद किसी दिन कबड्डी क्रिकेट को पछाड़ कर अपने उस स्थान पर काबिज़ हो जायेगा जहाँ उसे होना चाहिए।

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