सोमदेव देववर्मन: खेल से घटती रुचि के कारण मैंने लिया यह निर्णय

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सोमदेव देववर्मन: खेल से घटती रुचि के कारण मैंने लिया यह निर्णय

सोमदेव देववर्मन ने कहा कि टेनिस से उनकी रूचि कम हो रही थी ऐसे में उन्हें अपने पेशेवर कार्यकाल से संस्यास लेने में आसानी हुई। 31 वर्षीय खिलाड़ी ने आल इंडिया टेनिस एसोसिएशन में दूरदर्शिता के आभाव की आलोचना की और कहा कि उन्हें फेडरेशन से कोई उम्मीद नहीं थी और सारी ज़िम्मेदारी उन्होंने खुद ही संभाली थी।

31 दिसम्बर को देववर्मन ने पेशेवर टेनिस से सन्यास लेने का ऐलान किया, जिसके साथ ही उन्होंने अपने शानदार मगर चोट-युक्त कार्यकाल पर विराम लगाया। उन्होंने एशियन और कामनवेल्थ गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था, और दोनों में स्वर्ण पदक भी हासिल किये थे।

2009 के चेन्नई ओपन के बाद, वह सबकी नज़रों में आएं। उस प्रतियोगिता में उन्होंने कार्लोस मोया और इवो कार्लोविच को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी, जिसमें वह मरीन सिलिक से हार बैठे।

"कुछ चीज़ों के बारे में आप झूठ नहीं बोल सकते, और टेनिस के मामले वह चीज़ आपकी रूचि है। वह मेरी सबसे मज़बूत कड़ी थी, जिस चीज़ ने मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया वह मेरी रूचि थी, लेकिन हर साल उसमें कमी आती गयी। जब मैं यह समझ गया कि सर्वोच्च 100 में रहना मेरे लिए मुश्किल होगा, तो मेरे लिए निर्णय लेना आसान हो गया," देववर्मन ने द हिन्दू से कहा।

"मैं नहीं जानता कि क्या मैं यहाँ रहूँगा या स्टेट्स में या खिलाड़ियों के प्रशिक्षण में हिस्सा लूँगा। मैंने कई अच्छे काम किये हैं और मेरे पास कुछ योजनायें भी हैं। मेरे कार्य की शैली अच्छी है और मैं योगदान दे सकता हूँ।

अगरतला मूल के खिलाड़ी ने AITA के खिलाड़ियों के प्रति रवैये की आलोचना की। उनका दावा है कि अगर उन्होंने उनकी बुराई की होती, तो उन्हें AITA से कॉल नहीं आता। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके पीछे हटने के पीछे वजह AITA ही है तो उन्होंने कहा, "पूरा तरह से नहीं।"

"मैंने उनसे कोई उम्मीद नहीं की थी! मुझे हमेशा से ही लगता था कि उन्हें संगठित करने में कोई दिलचस्पी नहीं है और ना ही वे पेशेवर टेनिस खिलाड़ियों को तैयार करना चाहते हैं। 2007 के डेविस कप मुकाबले के लिए मुझे बुलाया गया था और फिर एअरपोर्ट में मुझे अकेला छोड़ दिया गया! ये लोग बहुत ही ... गैर ज़िम्मेदार हैं ... और उसके बाद से मैंने उनपर भरोसा करना छोड़ दिया। मैं उनसे कोई उम्मीद नहीं करता था।"

देववर्मन का कहना है कि इतनी कम उम्र में सन्यास लेकर उन्हें बुरा नहीं लग रहा।

"मैं शुरुआत से लेकर अब तक की वृद्धि से काफी खुश हूँ। मैंने बेहतरीन न सही, पर, अच्छा खेला। अगर आप किसी 18 या 19 वर्षीय खिलाड़ी को मेरे जैसे कार्यकाल में देखेंगे तो आपको वह कुछ ख़ास नहीं लगेगा। जब मैं US गया, तो सबकी नज़रों से भी बाहर हो गया। फिर मैंने वापसी की और कुछ सालों तक सर्वोच्च 100 में रहा और भारत का सर्वश्रेष्ठ डेविस कप खिलाड़ी भी बना रहा। इसीलिए कार्यकाल के हिसाब से, कोई मलाल नहीं है, मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया," देववर्मन ने कहा।

2011 में 62 पोजीशन हासिल कर देववर्मन अपने कार्यकाल के सर्वोच्च रैंकिंग पर थे।

जब उनसे पूछा गया कि क्या वह खुद को सर्वोच्च 50 के लायक मानते हैं, तो देववर्मन ने कहा, "मुझे तो लगता है। अगर मैंने अपने कार्यकाल में थोड़ा और पहले अलग रास्ता चुना होता, तो यह संभव हो सकता था। पर अब यह सब कहना आसान है। 2011 काफी अहम होता अगर मुझे चोट न लगता। लेकिन यह सब सोचकर मैंने अपनी नींद नहीं उड़ाई है।"

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