हमारी समझ से कहीं बढ़कर है साक्षी मलिक का कांस्य पदक

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हमारी समझ से कहीं बढ़कर है साक्षी मलिक का कांस्य पदक

हान अरस्तु ने कहा था कि जहां पुरुष की वीरता नियंत्रण में है, वहीं स्त्री की आज्ञा का पालन करने में। हर वस्तु एक स्वरूप पाने को लालायित होती है जेसे की एक स्त्री पुरुष के लिए और एक बदसूरत खूबसूरती के लिए, स्त्री को पुरुष से कम दांत होते हैं, की एक स्त्री अपूर्ण पुरुष होती है या फिर एक विकृत रचना, इन सब ज्ञान भरी बातों के लिए उस वक्त इनकी प्रशंसा की गई। पर अब समय बदल रहा है। अगर आज वो जिंदा होते तो उन पर मुकदमा चलाकर गोली मार दी जाती या फिर उससे भी बुरा, उन्हें अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के लिए नामांकित कर दिया जाता।

पर आज के समय में भी ऐसे कई स्थान हैं जहां अरस्तू के विचारों का जश्न मनाया जाता है। 24 साल की लड़की जिसे अपने घर, अपनी जमीन से बेहद लगाव है, उसे भारत के राज्य हरियाणा से भी बहुत प्यार है। एक राज्य जिसने अपनी झूठी शान आॅनर कीलिंग और भ्रूण हत्या के जरिए बनाई हुई है। एक राज्य जहां खाप पंचायत के कुछ नासमझ लोग नियम बनाते हैं और पितृसत्तात्मक समाज के सरपरस्त के तौर पर काम करते हैं। मर्दों का वहां आदर किया जाता है और उस पर उठने वाले किसी भी सवाल पर असहमति प्रकट की जाती है, जैसे अखाड़ों में महिलाओं की कुश्ती।

भारत में कुश्ती प्राचीनतम खेलों में से एक है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख किया गया है, जहां सेना अपने शक्तिवर्द्धन के लिए इसका उपयोग किया करते थे। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि इसे पुरुषों का खेल माना जाता था और 1990 के मध्य तक भी इस देश में महिला कुश्ती न के बराबर थी। यहां तक की इसे हरियाणा में पहुंचने में और 6 सालों का वक्त लगा।

ईश्वर सिंह दहिया जो उस वक्त हरियाणा खेल विभाग के कोच थे, ने 2002 में लड़कों के साथ लड़कियों को भी कुश्ती का प्रशिक्षण देने की शुरूआत की तो पूर्व रेसलर और कोच ने उन्हें सलाह देते हुए कहा कि वो ‘शेरों के साथ बकरियां रख रहे हैं’। इसकी शुरूआत अनजाने में हुई और बहुत से लोग इससे खफा हो गए। इंटरनेशनल मुकाबले में भारत की नुमाइंदगी कर चुकी है सुनीता जून 2002 में अपने भाई के साथ छोटू राम सेंटर में दाखिले के सिलसिले में ईश्वर सिंह दहिया से मिली।

दहिया ने हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए अपने साक्षात्कार में बताया कि ‘‘वो (सुनीता) 14-15 साल की थी और उसके बाल छोटे थे। मैंने उसे एक लड़का समझ कर इजाजत दे दी। शाम को जब वो अपनी दोस्त कविता के साथ आई तब मुझे एहसास हुआ की वो एक लड़की है। लेकिन मैं पहले ही हामी भर चुका था इसलिए अब पीछे हटने का कोई सवाल नहीं था और इसी तरह लड़कियों का एक केन्द्र शुरू हुआ।

शुरूआती दौर में लड़कियां लड़कों के साथ प्रशिक्षण लेने में हिचकिचाती थीं। वो एक ऐसे समाज में पली-बढ़ी थी जहां उन्हें हर कदम पर ये याद दिलाया जाता था कि वो कौन हैं? ऐसे में डर स्वाभाविक था। उस वक्त लड़कियां रेसलिंग की किट का इस्तेमाल नहीं करती थीं, वो कुश्ती के लिए ट्रैक पैंट और टी-शर्ट ही पहनती थी। दरअसल ऐसा 2005 तक होता आया, जब दहिया ने अपने केन्द्र में प्रतियोगिता का आयोजन किया तब लड़कियों ने पूरी रेसलिंग किट का इस्तेमाल किया।

साक्षी मलिक जो ओलंपिक में मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला रेसलर बनी, वो उस वक्त 12 साल की थी और खेलों में आने वाली कठिनाईयों से अनभिज्ञ थी। दरअसल वो अखबार में छपा एक लेख था जिसने पहली बार उसका ध्यान खींचा। उस लेख में छपे चित्र में एक सीनियर महिला रेसलर हाथ में गदा लिए और पूरी किट पहने हुए दिखाई दीं। वो उस गदा और किट से इतनी उत्तेजित हुई कि वो दौड़ती हुई अपने माता-पिता के पास पहुंची और तस्वीर को दिखाते हुए बोली कि ‘‘मुझे ये वाला गेम करना है।’’

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ये सुनने में काफी सामान्य था। पर उस गांव की एक 12 साल की लड़की के लिए रेसलिंग करना सामान्य नहीं था। वो गांव जहां से वो आती है वो है- मोकहरा खास। ये एक गांव है जहां 2011 जनगणना के अनुसार औसत लिंग अनुपात 822 है, जो हरियाणा के औसत लिंग अनुपात 879 से भी कम है। हरियाणा के 834 की तुलना में इस गांव का शिशु लिंग अनुपात केवल 800 है। 2011 के जनगणना के अनुसार महिला साक्षरता दर 64.46 प्रतिशत है। ये आंकड़े एक कहानी बयां करते है, भले ही वो उसमें अच्छे न हो।

सौभाग्य से साक्षी ने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया जो खुले विचारों के थे और जिन्हें समाज द्वारा महिलाओं पर उठाए जाने वाले सवालिया निशान की परवाह नहीं थी। साक्षी को अपनी मां सुदेश मलिक का पूरा साथ मिला। समाज के कई सवालों के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को भरपूर प्रोत्साहन दिया। कई लोगों ने ये भी कहां कि दूसरे कुश्ती के खिलाड़ियों की तरह उनकी बेटी के कान भी बड़े हो जाएंगे, जिससे उन्हें अच्छा दूल्हा ढूंढने में भी दिक्कत आएगी।

यद्यपि साक्षी की मां ने हर एक बात को भुलाया। वो अपनी बेटी को रोहतक लेकर गई और उसका दाखिला ईश्वर सिंह दहिया के केन्द्र में करावाया। शुरूआती दौर में साक्षी ने ये कभी नहीं सोचा था की वो अपने देश के लिए मेडल जीतेगी या ओलंपिक में हिस्सा लेगी। फोगट बहनों की तरह ये एक ऐसे परिवार से नहीं आई थी जहां खेलों का बेहतर इतिहास रहा हो। इसलिए उसके आसपास इतने लोग नहीं थे जो उसका मार्गदर्शन कर सकते और उसके लिए लक्ष्य निर्धारित करते। एकमात्र चीज जिसे वो कुश्ती के जरिए हासिल करना चाहती थी वो था हवाई जहाज की यात्रा और उसने ये हासिल कर भी लिया।

रोहतक से रियो तक का सफर साक्षी के लिए बेहद यादगार रहा। इस यात्रा में उसने अपने आलोचकों को अपना मुरीद बनाया और वो लोग जो 12 साल पहले उसकी मां से प्रश्न पूछा करते थे आज उसकी जीत का जश्न मना रहे हैं। इस ढोंगी समाज से पीछा छुड़ाना मुश्किल है क्योंकि हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं। अगर साक्षी अपने करियर में असफल हो जाती तो क्या उसके पड़ोसी इस तरह से जश्न मनाते, शायद सार्वजनिक तौर पर नहीं लेकिन बंद कमरों में कानाफुसी जरूर करते।

12 दिनों की जद्दोजहद के बाद ओलंपिक में हासिल हुए पहले पदक ने पूरे देश में हुंकार भर दी। भारतीय इतिहास में पहली बार ओलंपिक के लिए सबसे बड़ा दल भेजा गया था लेकिन इस दल से जितनी उम्मीदें थी वो पूरी ना हो सकी। लेकिन हमें इस बात को भी याद रखना चाहिए कि रियो ने हमें बहुत से अविस्मरणीय पल जैसे फाइनल में दीपा कर्माकर का प्रोदूनोवा, 36 साल के लंबे अंतराल के बाद भारतीय महिला हाॅकी टीम का खेलना, ललिता बाबर का नेशनल रिकाॅर्ड तोड़ना, पी वी सिंधू की विश्व नंबर 2 खिलाड़ी वांग यिहान पर शानदार जीत या साक्षी का अविश्वसनीय तरीके से वापसी करते हुए कांस्य जीतना, हमें महिला एथलीटों ने दिए हैं। यही हमारी ओलंपिक में सबसे बड़ी कामयाबी है। साक्षी का पदक हरियाणा जैसे राज्यों के लिए एक ऐसी छाप है जो कांस्य से लिखी गई है।

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